Saturday, 2 February 2013
प्राकृतिक सुंदरता को अपने में समेटे हैं चन्दौली
प्राकृतिक सुंदरता को अपने में समेटे चन्दौली एक खूबसूरत पर्यटक स्थल है। वाराणसी से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस जिले का प्राशासनिक मुख्यालय चन्दौली है। चन्दौली जिले की स्थापना चन्द्र शाह ने की थी। रामनगर, चन्द्रप्रभा वन्य-जीव अभ्यारण, चन्दौली और धानपुर यहां के प्रमुख स्थलों में से है। यह जिला बिहार राज्य के पूर्व, गाजीपुर जिले के उत्तर-पूर्व, सोनभद्र जिले के दक्षिण, बिहार के दक्षिण-पूर्व और मिर्जापुर के दक्षिण-पश्चिम से घिरा हुआ है। चन्दौली स्थित चहनिया खण्ड ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्व रखता है। माना जाता है कि भगवान राम की पत्नी सीता इस जगह पर कुछ समय के लिए रही थी। वर्तमान समय में इस जगह को धनधौर के नाम से जाना जाता है। अपने प्रवास के दौरान सीता जिस स्थान पर रही थी तपस्वी वाल्मीकि ने सीता के लिए वहां अपना आश्रम बनाया था।
मुख्य आकर्षण
रामनगर
गंगा नदी के तट पर स्थित रामनगर, वाराणसी से लगभग सात और मुगलसराय से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रामनगर वाराणसी के महाराजा बलवन्त सिंह का स्थानीय आवास था। यहां स्थित रामनगर किले का निर्माण 1750 ई. में किया गया था। रामनगर किले में एक खूबसूरत मंदिर स्थित है। यह मंदिर वेद व्यास को समर्पित है। इसके अतिरिक्त किले में एक खूबसूरत कुण्ड भी है। वर्तमान समय में इस जगह को संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। इस संग्रहालय में सजी हुई पालकी, महाराजा के वस्त्र आदि प्रदर्शित किए गए है।
चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभ्यारण
चन्दौली जिला स्थित चन्द्रप्रभा वन्य जीव अभ्यारण वाराणसी के दक्षिण.पूर्व से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस अभ्यारण की स्थापना 1957 ई. के दौरान हुई थी। नौगढ़ और विजयगढ़ पर्वत पर स्थित यह अभ्यारण लगभग 78 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभ्यारण में विभिन्न पशु-पक्षी जैसे साम्बर, भालू, नीलगाय, चीता आदि देखे जा सकते हैं। इस अभ्यारण में घूमने के लिए सबसे उचित समय नवम्बर के मध्य से जून के मध्य तक का है।
चन्दौली
चन्दौली वाराणसी से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर है। चन्दौली की स्थापना नरोतम राय परिवार के बरहुलिया राजपुर चन्द्र साह ने करवाई थी। उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम रखा गया था। इस जगह पर उन्होंने एक किले का निर्माण भी करवाया था।
धानपुर
चन्दौली जिला स्थित धानपुर यहां के महत्वपूर्ण शहरों में से एक है। यह जगह चन्दौली के उत्तर और वाराणसी से लगभग 42 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां स्थित धानपुर शहीद स्मारक इस जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है।
कैसे जाएं
वायु मार्ग
सबसे निकटतम हवाई अड्डा वाराणसी स्थित बाबतपुर है। यह जगह मुगलसराय से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दिल्ली, आगरा, खुजराहो, कलकत्ता, मुम्बई, लखनऊ और भुवनेशवर से वायुमार्ग द्वारा यहां पहुंचा जा सकता है।
रेल मार्ग
सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन मुगलसराय और वाराणसी है। चन्दौली से मुगलसराय आठ किलोमीटर और वाराणसी 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
सड़क मार्ग
चन्दौली सड़क मार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।
मनमोहक तटों से गुंटूर केा नवाजा
प्रकृति ने अपनी खूबसूरती ऊचें पहाड़ों, हरीभरी घाटियों, कलकल बहती नदियों और मनमोहक तटों से गुंटूर केा नवाजा है। यहां की छटा देखते ही बनती है। गुंटूर अपने धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों तथा चटपटे अचार के लिए दुनिया को अपने ओर आकर्षित करता है। गुंटूर आंध्र प्रदेश प्रान्त का एक शहर है। आंध्र प्रदेश के उत्तर पूर्वी भाग में कृष्णा नदी डेल्टा में स्थित है गुंटूर। विजयवाड़ा-चेन्नई ट्रंक रोड पर स्थित गुंटूर की स्थापना फ्रांसिसी शासकों ने आठवीं शताब्दी के मध्य में की थी। करीब 10 शताब्दियों तक उन्होंने गुंटूर में राज किया। बाद में 1788 में इसे ब्रिटिश साग्राज्य में मिला दिया गया। गुंटूर बौद्ध धर्म का भी प्रमुख केंद्र रहा है।
मुख्य आकर्षण
भवनारायण स्वामी मंदिर
गुंटूर से 49 किमी. दूर बपाट्ला का भवनारायण स्वामी मंदिर भगवान भवनारायण को समर्पित है। समय बीतने के साथ अब इन्हें बापट्ला के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गुंटूर जिले का सबसे प्राचीन और सबसे प्रमुख मंदिर है। इतिहास और शिल्प की दृष्टि से मंदिर का बहुत महत्व है।
अमरावती
अमरावती गुंटूर से 35 किमी. दूर उत्तर-पश्चिम में कृष्णा नदी के किनारे स्थित है। यहां पूरे वर्ष श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है इसलिए यहां पर्यटकों के लिए सुविधाओं की अच्छी व्यवस्था है। यहां भगवान शिव के प्रमुख मंदिरों में से एक अमरेश्वर है जहां शिवरात्रि के अवसर पर भक्तों की भारी भीड़ होती है। अमरावती में विश्वप्रसिद्ध बौद्ध स्तूप भी है जहां भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित चित्रों को देखा जा सकता है।
कोटप्पा कोंडाकोटप्पा
कोंडा नरसराओपेट से 13 किमी. दक्षिण पश्चिम में स्थित है। यहां मुख्य रूप से ऋत्रिकोटेश्वर स्वामी की पूजा की आती है जिनका मंदिर पहाड़ की चोटी पर स्थित है। अब राज्य सरकार इस स्थान को पर्यटन और धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रयास कर रही है। इसके लिए यहां पर्यटन सुविधाएं बढ़ाए जाने की व्यवस्था की जा रही है।
मंगलागिरी
मंगलागिरी विजयवाड़ा-चेन्नई ट्रंक रोड पर स्थित है। प्रागैतिहासिक काल से ही यह स्थान बहुत प्रसिद्ध रहा है। मंगलागिरी पर्वत पर भगवान लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी का मंदिर है इसलिए इसे बहुत ही पवित्र पर्वत माना जाता है। माना जाता है कि जो जल भक्त प्रभु को चढ़ाते हैं उनमें से आधा भगवान पी लेते हैं और बाकी आधा भक्त प्रसाद के रूप में ले जाते हैं। लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी को पनकला नरसिम्हा स्वामी या पनकला स्वामी भी कहा जाता है।
नल्लापडु
गुंटूर से 5 किमी. दूर नल्लापडु या नसिंहपुरम का नाम यहां पहाड़ी पर स्थित नरसिंहस्वामी मंदिर के कारण पड़ा है। इस मंदिर के अलावा भी यहां कई प्राचीन मंदिर भी हैं। यहां के अगस्लेश्वरस्वामी मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह कई शताब्दी पुराना है। इस मंदिर में सुसज्जित ध्वजस्तंभम, पांच नागों की उकेरी गई प्रतिमाएं, शिव जी और ब्रह्मरंब, उनकी पत्नी की प्रतिमाएं तथा शंकराचार्य मंदिर दर्शनीय हैं।
पोंडुगला
गुटूर से 11 किमी. दूर पोंडुगला में बहुत सारे मंदिर हैं। इनमें सबसे प्रमुख मंदिर है गंटाला रामलिंगेश्वरा स्वामी मंदिर। इस मंदिर के स्तंभों में पाली में लिखे शिलालेखों को देखा जा सकता है। पास ही दंडीवगु नदी के किनारे स्थित अयेगरीपालम गांव में भी एक मंदिर है जहां संस्कृत में लिखे दो शिलालेख मिले हैं। इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है।
आसपास दर्शनीय स्थल
नागार्जुनसागर बांध
नागार्जुनसागर बांध निरूसंदेह भारत की शान है। यह पत्थर से बना दुनिया का सबसे ऊंचा बांध है। इस बांध का पानी नालगोंडा, प्रकासम, खम्मम और गुंटूर जैसे आंध्र प्रदेश के अनेक जिलों में सिंचाई के काम आता है।
नागार्जुनसागर श्रीसैलम अभ्यारण्य
3568 गर्व किमी. क्षेत्र में फैला यह अभ्यारण्य भारत में सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व माना जाता है। इसके अलावा यहां फूलों व वनस्पतियों की अनेक प्रजातियां भी पाई जाती हैं। अभ्यराण्य के साथ ही नागार्जुनसागर बांध है। यहां की गहरी घाटियों की सुंदरता देखते ही बनती है।
आवागमन वायु मार्ग
नजदीकी हवाई अड्डा गन्नवरम है।
रेल मार्ग
नजदीकी रेलवे स्टेशन गुंटूर और विजयवाड़ा हैं जो सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।
सड़क मार्ग
बस सेवाएं गुंटूर को जिले के अंदर व बाहर के प्रमुख स्थानों से जोड़ती हैं जिनमें राज्य मुख्यालय भी शामिल हैं।
Tuesday, 22 January 2013
टेंपल सिटी कांचीपुरम
कहीं कला के लिए अपार श्रद्धा है तो कहीं देव भक्ति में रमे लोगों की संख्या ज्यादा है। कुछ स्थानों की सुन्दरता देखकर स्वर्ग की उपमा दे दी है, तो किसी स्थान को देवभूमि करार दे दिया गया है। भारत देश विविधताओं से भरा हुआ है। विभिन्न संस्कृतियों को अपने समाहित किए इस देश के राज्यों को कुछ और करीब से जानने के लिए हमारे साथ चलिए।
पलार नदी के कि नारे बसा क ांचीपुरम भी देश का एक ऐसा ही अद़्भुत शहर है। क ांचीपुरम को पवित्र नगरों में गिना जाता है। इस शहर में तक रीबन 126 मंदिर स्थित हैं, जिस वजह से इसे 'टेप्पल सिटीÓ के नाम से भी जाना जाता है। कांचीपुरम के मंदिरों में आपको द्रविड़ शैली क ा आर्कि टेक्चर देखने क ो मिलेगा। यहां क ा सबसे बड़ा मंदिर भगवान शिव के लिए बना एक ंबरनाथ मंदिर है। इसी मंदिर के प्रांगण में स्थित एक 3,500 साल पुराना आम का पेड़ भी है, जिसे लोग बहुत पवित्र मानते हैं। देवी पार्वती के रुप को समर्पित क ामाक्षी अत्मा मंदिर अपने खूबसूरत आर्कि टेक्चर के लिए जाना जाता है। 11वीं शताब्दी में बने वर्धराजा पेरु मल मंदिर क ा भी पर्यटक ों में बहुत क्र ेज रहता है।
इतिहास पर डाले नजर
कांचीपुरम ईसा की आरम्भिक शताब्दियों में महत्त्वपूर्ण नगर था। सम्भवत: यह दक्षिण भारत का ही नहीं बल्कि तमिलनाडु का सबसे बड़ा केन्द्र था। बुद्धघोष के समकालीन प्रसिद्ध भाष्यकार धर्मपाल का जन्म स्थान यहीं था, इससे अनुमान किया जाता है कि यह बौद्धधर्मीय जीवन का केन्द्र था। यहाँ के सुन्दरतम मन्दिरों की परम्परा इस बात को प्रमाणित करती है कि यह स्थान दक्षिण भारत के धार्मिक क्रियाकलाप का अनेकों शताब्दियों तक केन्द्र रहा है। कांचीपुरम 7वीं शताब्दी से लेकर 9वीं शताब्दी में पल्लव साम्राज्य का ऐतिहासिक शहर व राजधानी हुआ करती थी। छठी शताब्दी में पल्लवों के संरक्षण से प्रारम्भ कर पन्द्रहवीं एवं सोलहवीं शताब्दी तक विजयनगर के राजाओं के संरक्षणकाल के मध्य 1000 वर्ष के द्रविड़ मन्दिर शिल्प के विकास को यहाँ एक ही स्थान पर देखा जा सकता है। 'कैलाशनाथार मंदिरÓ इस कला के चरमोत्कर्ष का उदाहरण है। एक दशाब्दी पीछे का बना 'बैकुण्ठ पेरुमलÓ इस कला के सौष्ठव का सूचक है। उपयुक्त दोनों मन्दिर पल्लव नृपों के शिल्पकला प्रेम के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
क्या देखें
कैलाशनाथ मंदिर
कांचीपुरम शहर के पश्चिम दिशा में स्थित यह मंदिर कांचीपुरम का सबसे प्राचीन और दक्षिण भारत के सबसे शानदार मंदिरों में एक है। इस मंदिर को आठवीं शताब्दी में पल्लव वंश के राजा राजसिम्हा ने अपनी पत्नी की प्रार्थना पर बनवाया था। मंदिर के अग्रभाग का निर्माण राजा के पुत्र महेन्द्र वर्मन तृतीय के करवाया था। मंदिर में देवी पार्वती और शिव की नृत्य प्रतियोगिता को दर्शाया गया है।
बैकुंठ पेरूमल मंदिर
भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में पल्लव राजा नंदीवर्मन पल्लवमल्ला ने करवाया था। मंदिर में भगवान विष्णु को बैठे, खड़े और आराम करती मुद्रा में देखा जा सकता है। मंदिर की दीवारों में पल्लव और चालुक्यों के युद्धों के दृश्य बने हुए हैं। मंदिर में 1000 स्तम्भों वाला एक विशाल हॉल भी है जो पर्यटकों को बहुत आकषित करता है। प्रत्येक स्तम्भ में नक्काशी से तस्वीर उकेरी गई हैं जो उत्तम कारीगर की प्रतीक हैं।
कामाक्षी अम्मन मंदिर
कामाक्षी अमां मंदिर यह मंदिर देवी शक्ति के तीन सबसे पवित्र स्थानों में एक है। मदुरै और वाराणसी अन्य दो पवित्र स्थल हैं। 1.6 एकड़ में फैला यह मंदिर नगर के बीचों-बीच स्थित है। मंदिर को पल्लवों ने बनवाया था। बाद में इसका पुनरोद्धार 14 वीं और 17वीं शताब्दी में करवाया गया।
वरदराज मंदिर
यह मंदिर उस काल के कारीगरों की कला का जीता जागता उदाहरण है। वरदराज मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर में उन्हें देवराजस्वामी के रूप में पूजा जाता है। मंदिर में 100 स्तम्भों वाला एक हाल है जिसे विजयनगर के राजाओं ने बनवाया था।
एकमबारानाथर मंदिर
यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर को पल्लवों ने बनवाया था। बाद में इसका पुर्ननिर्माण चोल और विजयनगर के राजाओं ने करवाया। 11 खंड़ों का यह मंदिर दक्षिण भारत के सबसे ऊंचे मंदिरों में एक है। मंदिर में बहुत आकर्षक मूर्तियां देखी जा सकती हैं। साथ ही यहां का 1000 पिलर का मंडपम भी खासा लोकप्रिय है।
वेदानथंगल और किरीकिरी पक्षी अभ्यारण्य
यह दोनों पक्षी अभ्यारण्य कांचीपुरम के अंदरूनी भाग में स्थित हैं। वेदानथंगल 30 हेक्टेयर और किरीकिरी 61 हेक्टेयर में फैला हुआ है। यह अभ्यारण्य बबूल और बैरिंगटोनिया पेड़ो से भर हुए हैं। इन अभ्यराण्य में पाकिस्तान, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और साइबेरियन पक्षियों को देखा जा सकता है। पिन्टेल्स, स्टिल्ट्स, गारगानी टील्स और सैंडपाइपर जसी पक्षियों की प्रजातियां यह नियमित रूप से देखी जा सकती हैं। इन दोनों अभ्यराण्य में तकरीबन 115 पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं।
साडिय़ों की करे खरीददारी
कांचीपुरम सिल्क फैब्रिक और हाथ से बुनी रेशमी साडिय़ों के लिए भी यह देश-दुनिया में मशहूर है। बुनाई करने वाले उच्च क्वालिटी की सिल्क और शुद्ध सोने के तार इन साडिय़ों पर इस्तेमाल कर एक से बढ़कर एक ख़ूबसूरत साडिय़ों का निर्माण करते हैं। इसलिए इसे सिल्क सिटी भी कहते हैं। कुछ खऱीदने की इच्छा हो तो इन सिल्क की साडिय़ों की शॉपिंग ज़रूर करें क्योंकि दूसरे शहरों के मुकाबले ये यहाँ उचित व कम दामों में मिल जाती हैं।
९०० वर्ष पहले का अस्पताल
तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले में तिरुमुकुदल गाँव के एक प्राचीन मंदिर में मिले एक शिलालेख से पता चलता है की यहाँ करीब 900 वर्ष पहले 15 इमक वाला एक अस्पताल और वैदिक स्कूल था वेंकटेश पेरूमल मंदिर में यह शिलालेख पुरातत्व विद केवी सुब्रमण्यम ने खोजा है शिला लेख में असुरा सलाई का उल्लेख है जो एक अस्पताल था भारतीय पुरातव सर्वे के अनुसार मंदिर से लगे इस अस्पताल में अंपका स्कूल के छात्रो और मंदिर के कर्मचारियों का उपचार किया जाता था इस मंदिर को संरक्षित इमारत घोषित किया जा चुका है और इसका प्रबंधन ऐ यस आई के जिम्मे है शिला लेख के अनुसार वीरचोला नामक अस्पताल में 15 बिस्तर थे इसमे काम करने वाले करने वाले कर्मचारियों की संख्या पर्याप्त थी जिसमे कोदंद रामन अस्वथामन भट्टन नामक एक सर्जन कई नर्से नौकर और एक नाइ शामिल थे अस्पताल के कर्मचारियों को वेतन दिया जाता था अस्पताल में राखी गयी करीब 20 दवाईयों का ब्योरा भी शिलालेख में है इन दवायों से बबासीर पीलिया बुखार पेसाब की नली की बीमारियाँ टीबी रक्तस्राव आदि का इलाज किया जाता था।
कैसे पहुंचे
वायु मार्ग : मंदिरों का शहर कांचीपुरम जाने लिए वायुमार्ग अच्छा है। यहां पहुंचने के लिए निकटतम एयरपोर्ट चैन्नई है जो लगभग 75 किमी. दूर है। चेन्नई से कांचीपुरम लगभग 2 घंटे में पहुंचा जा सकता है। आप एयरपोर्ट से बस से जा सकते हैं। इसके अलावा आप यहां से टैक्सी लेकर जा सकते हैं।
रेल मार्ग
देश के प्रत्येक कोने से रेलमार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है। कांचीपुरम का रेलवे स्टेशन चैन्नई, चेन्गलपट्टू, तिरूपति और बैंगलोर से जुड़ा है। स्टेशन से आप अपनी यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं।
सड़क मार्ग
कांचीपुरम तमिलनाडु के लगभग सभी शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा है। विभिन्न शहरों से कांचीपुरम के लिए नियमित अंतराल में बसें चलती हैं।
गया की संस्कृति का पर्याय हैं बुद्ध, तिलकुट और पिंड दान
बिहार का दूसरा सबसे बड़ा शहर और दुनिया भर के बौद्ध एवं हिन्दू धर्मावलंबियों द्वारा पवित्र माने जाने वाले शहर गया को बुद्ध, तिलकुट और 'पिंड दान के धार्मिक कर्मकांड के लिए जाना जाता है। पटना से दक्षिण में 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गया शहर
का बोद्धों और हिन्दुओं की धार्मिक गतिविधियों के लिहाज से ऐतिहासिक महत्व है। दोनों धर्म के लोग अपने धार्मिक कर्मकांड करने यहां हर साल आते हैं। फाल्गु या निरंजना नदी के तट पर स्थित इस शहर को हिन्दुओं में पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिए पिंड दान के लिए
सबसे महत्वपूर्ण जगह माना जाता है। पिंड दान हर साल हिन्दू पंचांग के अश्विन महीने :सितंबर-अक्तूबर: में किया जाता है। जिस अवधि में पिंड दान किया जाता है उसे 'पितृ पक्षÓ के रूप में जाना जाता है और दशहरा शुरू होने के दस दिन पहले यह समाप्त हो जाता है। इस अवधि को शादी, व्यापार और दूसरी गतिविधियों के लिए अशुभ माना जाता है। गया जिले से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बोधगया को बौद्ध श्रद्धालु सबसे पवित्र जगहों में से एक मानते हैं। यहां महाबोधि मंदिर और महोबोधि वृक्ष है जहां गौतम बुद्ध को ज्ञान मिला था। 2002 में महाबोधि मंदिर को यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल घोषित किया था। इतिहासकारों के अनुसार ज्ञान मिलने के 250 साल बाद अशोक यहां आए थे जिस दौरान मूल महाबोधि मंदिर का निर्माण किया गया था। बाद में इसका जीर्णोद्धार किया गया। महाबोधि मंदिर के अलावा यहां कई छोटे-बड़े मदिर हैं। इनमें थाई मंदिर, कर्म मंदिर, दाईजोक्यो बुद्ध मंदिर, 80-फुट मंदिर, निप्पन मंदिर आदि शामिल हैं। वहीं शहर की यात्रा के अनुभव को यहां का प्रसिद्ध 'तिलकुटÓ मीठा बनाता है। यह तिल औैर चीनी के मिश्रण से बनता है। एक स्थानीय विक्रेता विनोद केशरी ने कहा, ''गया और तिलकुट दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। गया का तिलकुट देश में सबसे अच्छा और बेजोड़ होता है।ÓÓ उसने कहा, ''छठ पूजा (आमतौर पर नवंबर) के समय तिलकुट का मौसम शुरू हो जाता है और यह मकर संक्रांति :मध्य जनवरी: तक मिलता है।ÓÓ विष्णुपद मंदिर फल्गु नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित यह मंदिर पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान विष्णु के पदचिन्हों पर किया गया है। यह मंदिर 30 मीटर ऊंचा है जिसमें आठ खंभे हैं। इन खंभों पर चांदी की परतें चढ़ाई हुई है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के 40 सेंटीमीटर लंबे पांव के निशान हैं। इस मंदिर का 1787 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई ने नवीकरण करवाया था। पितृपक्ष के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जुटती है।
जामा मस्जिद
जामा मस्जिद बिहार की सबसे बड़ी मस्जिद है। यह तकरीबन 200 साल पुरानी है। इसमे हजारों लोग साथ में नमाज अदा कर सकते है।
बिथो शरीफ
मुख्य नगर से 10 कि मी दूर गया पटना मार्ग पर स्थित एक पवित्र धर्मिक स्थल है। यहा नवी सदी हिजरी मे चिशती अशरफि सिलसिले के प्रख्यात सूफी सत हजरत मखदूम सयद दर्वेश अशरफ ने खानकाह अशरफिया की स्थापना की थी। आज भी पूरे भारत से श्रदालु यहा दर्शन के लिये आते है। हर साल इस्लामी मास शाबान की 10 तारीख को हजरत मखदूम सयद दर्वेश अशरफ का उर्स मनाया जाता है।
बानाबर (बराबर)पहाड़
गया से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर बेलागंज से 10 किलोमीटर पूरब मे स्थित है। इसके ऊपर भगवान शिव का मन्दिर है, जहाँ हर वर्ष हजारों श्रद्धालु सावन के महीने मे जल चढ़ते है। कहते हैं इस मन्दिर को बानासुर ने बनवाया था। पुन: सम्राट अशोक ने मरम्मत करवाया। इसके नीचे सतघरवा की गुफा है, जो प्राचीन स्थापत्य कला का नमूना है। इसके अतिरिक्त एक मार्ग गया से लगभग 30 किमी उत्तर मखदुमपुर से भी है। इस पर जाने हेतु पातालगंगा, हथियाबोर और बावनसीढ़ी तीन मार्ग है, जो क्रमश: दक्षिण, पश्चिम और उत्तर से है, पूरब में फलगू नदी है।
कोटेस्वरनाथ
यह अति प्राचीन शिव मन्दिर मोरहर नदी के किनारे मेन गांव में स्थित है। यहां हर वर्ष शिवरात्रि में मेला लगता है। यहाँ पहुँचने हेतु गया से लगभग 30 किमी उत्तर पटना-गया मार्ग पर स्थित मखदुमपुर से पाईबिगहा समसारा होते हुए जाना होता है। गया से पाईबिगहा के लिये सीधी बस सेवा उपलब्ध है। पाईबिगहा से इसकी दूरी लगभग 2 किमी है।
सूर्य मंदिर
सूर्य मंदिर प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर के 20 किलोमीटर उत्तर और रेलवे स्टेशन से 3 किलोमीटर दूर स्थित है। भगवान सूर्य को समर्पित यह मंदिर सोन नदी के किनारे स्थित है। दिपावली के छह दिन बाद बिहार के लोकप्रिय पर्व छठ के अवसर पर यहां तीर्थयात्रियों की जबर्दस्त भीड़ होती है। इस अवसर पर यहां मेला भी लगता है।
ब्रह्मयोनि पहाड़ी
इस पहाड़ी की चोटी पर चढऩे के लिए 440 सीढिय़ों को पार करना होता है। इसके शिखर पर भगवान शिव का मंदिर है। यह मंदिर विशाल बरगद के पेड़ के नीचे स्थित हैं जहां पिंडदान किया जाता है। इस स्थान का उल्लेख रामायण में भी किया गया है। दंतकथाओं पर विश्वास किया जाए तो पहले फल्गु नदी इस पहाड़ी के ऊपर से बहती थी। लेकिन देवी सीता के शाप के प्रभाव से अब यह नदी पहाड़ी के नीचे से बहती है। यह पहाड़ी हिन्दुओं के लिए काफी पवित्र तीर्थस्थानों में से एक है। यह मारनपुर के निकट है
बराबर गुफा
यह गुफा गया से 20 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। इस गुफा तक पहुंचने के लिए 7 किलोमीटर पैदल और 10 किलोमीटर रिक्शा या तांगा से चलना होता है। यह गुफा बौद्ध धर्म के लिए महत्वपूर्ण है। यह बराबर और नागार्जुनी श्रृंखला के पहाड़ पर स्थित है। इस गुफा का निर्माण बराबर और नागार्जुनी पहाड़ी के बीच सम्राट अशोक और उनके पोते दशरथ के द्वारा की गई है। इस गुफा उल्लेख ईएम फोस्टर की किताब, पैसेज टू इंडिया में भी किया गया है। इन गुफाओं में से 7 गुफाएं भारतीय पुरातत्व विभाग की देखरख में है।
महाबोधि मंदिर
यह मंदिर मुख्य मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की बनावट सम्राट अशोक द्वारा स्थापित स्तूप के समान हे। इस मंदिर में बुद्ध की एक बहुत बड़ी मूत्र्ति स्थापित है। यह मूत्र्ति पदमासन की मुद्रा में है। यहां यह अनुश्रुति प्रचिलत है कि यह मूत्र्ति उसी जगह स्थापित है जहां बुद्ध को ज्ञान निर्वाण (ज्ञान) प्राप्त हुआ था। मंदिर के चारों ओर पत्थर की नक्काशीदार रेलिंग बनी हुई है। ये रेलिंग ही बोधगया में प्राप्त सबसे पुराना अवशेष है। इस मंदिर परिसर के दक्षिण-पूर्व दिशा में प्राकृतिक दृश्यों से समृद्ध एक पार्क है जहां बौद्ध भिक्षु ध्यान साधना करते हैं। आम लोग इस पार्क में मंदिर प्रशासन की अनुमति लेकर ही प्रवेश कर सकते हैं।
इस मंदिर परिसर में उन सात स्थानों को भी चिन्हित किया गया है जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद सात सप्ताह व्यतीत किया था। जातक कथाओं में उल्लेखित बोधि वृक्ष भी यहां है। यह एक विशाल पीपल का वृक्ष है जो मुख्य मंदिर के पीछे स्थित है। कहा जाता बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। वर्तमान में जो बोधि वृक्ष वह उस बोधि वृक्ष की पांचवीं पीढी है। मंदिर समूह में सुबह के समय घण्टों की आवाज मन को एक अजीब सी शांति प्रदान करती है। मुख्य मंदिर के पीछे बुद्ध की लाल बलुए पत्थर की 7 फीट ऊंची एक मूत्र्ति है। यह मूत्र्ति विजरासन मुद्रा में है। इस मूत्र्ति के चारों ओर विभिन्न रंगों के पताके लगे हुए हैं जो इस मूत्र्ति को एक विशिष्ट आकर्षण प्रदान करते हैं। कहा जाता है कि तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में इसी स्थान पर सम्राट अशोक ने हीरों से बना राजसिहांसन लगवाया था और इसे पृथ्वी का नाभि केंद्र कहा था। इस मूत्र्ति की आगे भूरे बलुए पत्थर पर बुद्ध के विशाल पदचिन्ह बने हुए हैं। बुद्ध के इन पदचिन्हों को धर्मचक्र प्रर्वतन का प्रतीक माना जाता है। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद दूसरा सप्ताह इसी बोधि वृक्ष के आगे खड़ा अवस्था में बिताया था। यहां पर बुद्ध की इस अवस्था में एक मूत्र्ति बनी हुई है। इस मूत्र्ति को अनिमेश लोचन कहा जाता है। मुख्य मंदिर के उत्तर पूर्व में अनिमेश लोचन चैत्य बना हुआ है। मुख्य मंदिर का उत्तरी भाग चंकामाना नाम से जाना जाता है। इसी स्थान पर बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद तीसरा सप्?ताह व्यतीत किया था। अब यहां पर काले पत्थर का कमल का फूल बना हुआ है जो बुद्ध का प्रतीक माना जाता है। महाबोधि मंदिर के उत्तर पश्चिम भाग में एक छतविहीन भग्नावशेष है जो रत्नाघारा के नाम से जाना जाता है। इसी स्थान पर बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद चौथा सप्ताह व्यतीत किया था। दन्तकथाओं के अनुसार बुद्ध यहां गहन ध्यान में लीन थे कि उनके शरीर से प्रकाश की एक किरण निकली। प्रकाश की इन्हीं रंगों का उपयोग विभिन्न देशों द्वारा यहां लगे अपने पताके में किया है। माना जाता है कि बुद्ध ने मुख्य मंदिर के उत्तरी दरवाजे से थोड़ी दूर पर स्थित अजपाला-निग्रोधा वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति के बाद पांचवा सप्ताह व्यतीत किया था। बुद्ध ने छठा सप्ताह महाबोधि मंदिर के दायीं ओर स्थित मूचालिंडा क्षील के नजदीक व्यतीत किया था। यह क्षील चारों तरफ से वृक्षों से घिरा हुआ है। इस क्षील के मध्य में बुद्ध की मूत्र्ति स्थापित है। इस मूत्र्ति में एक विशाल सांप बुद्ध की रक्षा कर रहा है। इस मूत्र्ति के संबंध में एक दंतकथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार बुद्ध प्रार्थना में इतने तल्लीन थे कि उन्हें आंधी आने का ध्यान नहीं रहा। बुद्ध जब मूसलाधार बारिश में फंस गए तो सांपों का राजा मूचालिंडा अपने निवास से बाहर आया और बुद्ध की रक्षा की। इस मंदिर परिसर के दक्षिण-पूर्व में राजयातना वृक्ष है। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना सांतवा सप्ताह इसी वृक्ष के नीचे व्यतीत किया था। यहीं बुद्ध दो बर्मी (बर्मा का निवासी) व्यापारियों से मिले थे। इन व्यापारियों ने बुद्ध से आश्रय की प्रार्थना की। इन प्रार्थना के रुप में बुद्धमं शरणम गच्छामि (मैं अपने को भगवान बुद्ध को सौंपता हू) का उच्चारण किया। इसी के बाद से यह प्रार्थना प्रसिद्ध हो गई।
तिब्बतियन मठ
महाबोधि मंदिर के पश्चिम में पांच मिनट की पैदल दूरी पर स्थित जोकि बोधगया का सबसे बड़ा और पुराना मठ है 1934 ई. में बनाया गया था। बर्मी विहार (गया-बोधगया रोड पर निरंजना नदी के तट पर स्थित) 1936 ई. में बना था। इस विहार में दो प्रार्थना कक्ष है। इसके अलावा इसमें बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा भी है। इससे सटा हुआ ही थाई मठ है (महाबोधि मंदिर परिसर से 1किलोमीटर पश्चिम में स्थित)। इस मठ के छत की सोने से कलई की गई है। इस कारण इसे गोल्डेन मठ कहा जाता है। इस मठ की स्थापना थाईलैंड के राजपरिवार ने बौद्ध की स्थापना के 2500 वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में किया था।
इंडोसन-निप्पन-जापानी मंदिर
महाबोधि मंदिर परिसर से 11.5 किलोमीटर दक्षिणपश्चिम में स्थित मंदिर का निर्माण 1972-73 में हुआ था। इस मंदिर का निर्माण लकड़ी के बने प्राचीन जापानी मंदिरों के आधार पर किया गया है। इस मंदिर में बुद्ध के जीवन में घटी महत्वपूर्ण घटनाओं को चित्र के माध्यम से दर्शाया गया है। चीनी मंदिर (महाबोधि मंदिर परिसर के पश्चिम में पांच मिनट की पैदल दूरी पर स्थित) का निर्माण 1945 ई. में हुआ था। इस मंदिर में सोने की बनी बुद्ध की एक प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का पुनर्निर्माण 1997 ई. किया गया था। जापानी मंदिर के उत्तर में भूटानी मठ स्थित है। इस मठ की दीवारों पर नक्काशी का बेहतरीन काम किया गया है। यहां सबसे नया बना मंदिर वियतनामी मंदिर है। यह मंदिर महाबोधि मंदिर के उत्तर में 5 मिनट की पैदल दूरी पर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 2002 ई. में किया गया है। इस मंदिर में बुद्ध के शांति के अवतार अवलोकितेश्वर की मूत्र्ति स्थापित है। इन मठों और मंदिरों के अलावा के कुछ और स्मारक भी यहां देखने लायक है। इन्हीं में से एक है भारत की सबसे ऊंचीं बुद्ध मूत्र्ति जो कि 6 फीट ऊंचे कमल के फूल पर स्थापित है। यह पूरी प्रतिमा एक 10 फीट ऊंचे आधार पर बनी हुई है। स्थानीय लोग इस मूत्र्ति को 80 फीट ऊंचा मानते हैं।
आसपास के दर्शनीय स्थल
बोधगया आने वालों को राजगीर भी जरुर घूमना चाहिए। यहां का विश्व शांति स्तूप देखने में काफी आकर्षक है। यह स्तूप ग्रीधरकूट पहाड़ी पर बना हुआ है। इस पर जाने के लिए रोपवे बना हुआ। इसका शुल्क 25 रु है। इसे आप सुबह 8 बजे से दोपहर 12.50 बजे तक देख सकते हैं। इसके बाद इसे दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे तक देखा जा सकता है। शांति स्तूप के निकट ही वेणु वन है। कहा जाता है कि बुद्ध एक बार यहां आए थे। राजगीर में ही प्रसद्धि सप्तपर्णी गुफा है जहां बुद्ध के निर्वाण के बाद पहला बौद्ध सम्मेलन का आयोजन किया गया था। यह गुफा राजगीर बस पड़ाव से दक्षिण में गर्म जल के कुंड से 1000 सीढियों की चढाई पर है। बस पड़ाव से यहां तक जाने का एक मात्र साधन घोड़ागाड़ी है जिसे यहां टमटम कहा जाता है। इन सबके अलावा राजगीर मे जरासंध का अखाड़ा, स्वर्णभंडार (दोनों स्थल महाभारत काल से संबंधित है) तथा विरायतन भी घूमने लायक जगह है। नालन्दा यह स्थान राजगीर से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। प्राचीन काल में यहां विश्व प्रसिद्ध नालन्दा विश्वविद्यालय स्थापित था। अब इस विश्वविद्यालय के अवशेष ही दिखाई देते हैं। लेकिन हाल में ही बिहार सरकार द्वारा यहां अंतरराष्ट्रीय विश्व विद्यालय स्थापित करने की घोषणा की गई है जिसका काम प्रगति पर है। यहां एक संग्रहालय भी है। इसी संग्रहालय में यहां से खुदाई में प्राप्त वस्तुओं को रखा गया है। नालन्दा से 5 किलोमीटर की दूरी पर प्रसिद्ध जैन तीर्थस्थल पावापुरी स्थित है। यह स्थल भगवान महावीर से संबंधित है। यहां महावीर एक भव्य मंदिर है। नालन्दा-राजगीर आने पर इसे जरुर घूमना चाहिए। नालन्दा से ही सटा शहर बिहार शरीफ है। मध्यकाल में इसका नाम ओदन्तपुरी था। वर्तमान में यह स्थान मुस्लिम तीर्थस्थल के रुप में प्रसिद्ध है। यहां मुस्लिमों का एक भव्य मस्जिद बड़ी दरगाह है। बड़ी दरगाह के नजदीक लगने वाला रोशनी मेला मुस्लिम जगत में काफी प्रसिद्ध है। बिहार शरीफ घूमने आने वाले को मनीराम का अखाड़ा भी अवश्य घूमना चाहिए। स्थानीय लोगों का मानना है अगर यहां सच्चे दिल से कोई मन्नत मांगी जाए तो वह जरुर पूरी होती है।
Sunday, 20 January 2013
अम्बा वाला अर्थात अम्बाला
हरियाणा में स्थित अम्बाला बहुत खूबसूरत स्थान है। कहा जाता है कि अम्बाला की स्थापना अम्बा राजपूतों ने 14वीं शताब्दी में की थी। अम्बाला शहर भारत के हरियाणा राज्य का एक मुख्य एवं ऐतिहासिक शहर है। यह भारत की राजधानी दिल्ली से दो सौ किलो मीटर उत्तर की ओर शेरशाह सूरी मार्ग(राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 1) पर स्थित है। अंबाला छावनी एक प्रमुख रेलवे जंक्शन है। अंबाला जिला हरियाणा एंव पंजाब राज्यों की सीमा पर स्थित है। अंबाला छावनी देश का प्रमुख सैन्य आगार है। भौगोलिक स्थिति के कारण पर्यट्न के क्षेत्र में भी अंबाला का मह्त्वपूर्ण योगदान है।
अम्बाला नाम की उत्पत्ति शायद महाभारत की अम्बालिका के नाम से हुई होगी। आज के जमाने में अम्बाला अपने विज्ञान सामग्री उत्पादन व मिक्सी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। अम्बाला को विज्ञान नगरी कह कर भी पुकारा जाता है कयोंकि यहां वैज्ञानिक उपकरण उद्योग केंद्रित है। भारत के वैज्ञानिक उपकरणों का लगभग चालीस प्रतिशत उत्पादन अम्बाला में ही होता है। एक अन्य मत यह भी है कि यहां पर आमों के बाग बगीचे बहुत थे, जिससे इस का नाम अम्बा वाला अर्थात अम्बाला पड़ गया। इसके पास आमों की खेती की जाती है। बइन इकाईयों में धातु तैयार करने वालीए रसोईघर में काम आने वाले उपकरण बनाने वाली और पानी के पम्प बनाने वाली इकाईयां प्रमुख हैं।
इसके पास ही बराड़ा, नागल, मुलाणा, साहा और शहजादपुर आदि शहर भी हैं। पर्यटक चाहें तो इन शहरों में भी घूमने जा सकते हैं। इसके दक्षिण-पूर्व में यमुनानगर, दक्षिण में कुरूक्षेत्र और पश्चिम में पटियाला व रोपड़ स्थित हैं। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 900 फीट है। यह धार्मिक पर्यटन स्थलों से भरा पड़ा है। पर्यटक चाहें तो इन पर्यटक स्थलों की यात्रा पर जा सकते हैं।
पर्यटक यहां क्या देखें
अम्बाला अपने धार्मिक तीर्थस्थलों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। इन स्थलों में मन्दिर, गुरूद्वारे, चर्च और दरगाह-मस्जिदें प्रमुख हैं। पर्यटक यहां पर हिन्दुओं की देवी भवानी का मन्दिर देख सकते हैं। इस मन्दिर का नाम भवानी अम्बा है। मन्दिर देखने के बाद पर्यटक गुरूद्वारे देख सकते हैं। बादशाही बाग गुरूद्वारा, शीशगंज गुरूद्वारा, मंजी साहिब गुरूद्वारा और संगत साहिब गुरूद्वारा यहां के प्रमुख गुरूद्वारे हैं। सिक्ख गुरूओं गुरू गोबिंद सिंह, गुरू तेगबहादुर और गुरू हरगोबिंद सिंह का भी इन गुरूद्वारों से संबंध रहा है। गुरूद्वारों के अलावा यहां का लखीशाह, तैक्वाल शाह और सेंट पॉल चर्च भी पर्यटकों को बहुत पसंद आते हैं। चर्च के पास ही एक कब्रिस्तान भी है।
यह सब देखने के बाद पर्यटक अम्बाला कैंट में स्थित पटेल पार्क और अम्बाला शहर का सिटी पार्क घूमने जा सकते हैं। इन बगीचों के पास बुरिया में रंगमहल भी है। यह महल बहुत खूबसूरत है। इस महल की आर्क, स्तम्भ और नक्काशी पर्यटकों को बहुत पसंद आती है। इसका निर्माण शाहजहां के शासनकाल में किया गया था।
गुरुदवारा श्री बादशाही बाग साहिब : अम्बाला शहर में सथित है। गुरुदवारा साहिब हिसार को जाने वाली सड़क के पास सथित है। इस अस्थान पर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज फागुन की पूरनमाशी को आए थे। गुरु साहिब के साथ मामा कृपाल चंद जीए कई सिख, नीला घोड़ा तथा सफ़ेद बाज़ था। गुरु साहिब लखनोर से शिकार खेलते हुए यहाँ आए। शहर का पीर अमीर दीन अपने बाग़ में बाज़ लेकर खड़ा था। जब उसने गुरु साहिब का सफ़ेद बाज़ देखा तो पीर का मन बेईमान हो गया द्य उसने गुरु साहिब को कहा कि मेरे बाज़ के साथ अपने बाज़ को लड़वाओ, गुरु साहिब अन्तर्यामी थे, समझ गए कि पीर नीती से बाज़ लेना चाहता है।
Wednesday, 16 January 2013
हरियाणा यात्रा : वैभवशाली आकर्षक रेवाड़ी
हरियाणा के रेवाड़ी का अतीत बड़ा वैभवशाली रहा है। यह प्राचीन शहर अपने आंचल में स्वर्णिम अतीत समेटे हुए है। यह नगर प्राचीनकाल में न केवल राजनैतिक बल्कि कला, साहित्य, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा है। यहां पर हेमू की हवेली, राव तुलाराम का महल, रानी की ड्योढ़ी, तेज सरोवर, हनुमान मंदिर एवं घंटेश्वर मंदिर आदि रेवाड़ी की प्राचीन भव्यता एवं स्वर्णिम इतिहास के साक्षी हैं। यह दिल्ली से मात्र 80 किमी. की दूरी पर स्थित है। महाभारत के अनुसार यह माना जाता है कि पहले यहां पर रेवात नामक राजा का राज था। उसकी पुत्री का नाम रेवती था। वह उसे प्यार से रेवा पुकारता था। उसी के नाम पर उसने इसका नरम रेवा वाड़ी रखा था। बाद में इसका नाम रेवा वाड़ी से बदलकर रेवाड़ी हो गया।
आधुनिक रेवाड़ी की स्थापना 1 नवम्बर 1989 ई. में की गई। इसके उत्तर में रोहतक, पश्चिम में महेन्द्रगढ़, पूर्व में गुडग़ांव और दक्षिण-पूर्व में राजस्थान का अल्वर स्थित है। हाल के दिनों में रेवाड़ी का जबरदस्त विकास हुआ है। विशेष तौर पर इसके धारूहेड़ा क्षेत्र में कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की स्थापना की गई हैं। इन कम्पनियों में इण्डो निशीयन फूड्स लिमिटेड, सोनी इण्डिया लिमिटेड, अशाही इण्डिया और दुपहिया वाहन बनाने वाली विश्व की सबसे बड़ी कम्पनी हीरो होंडा प्रमुख हैं। रेवाड़ी में क्या देखें लाल मस्जिद
रेवाड़ी का लाल मस्जिद पर्यटकों को अपने ओर आकर्षित करता है। यह मस्जिद रेवाड़ी की अदालत के पास स्थित है। यह मस्जिद बहुत खूबसूरत है और इसे देखने के लिए पर्यटक दूर-दूर से यहां आते हैं। इसका निर्माण अकबर के शासनकाल में 1570 ई. में किया गया था। मस्जिद के पास दो खूबसूरत दर्शनीय स्थल भी हैं। पर्यटक चाहें तो इनकी सैर के लिए जा सकते हैं।
बाग वाला तालाब
यह तालाब पुरानी तहसील के पास स्थित है। इसका निर्माण राव गुर्जर के पुत्र राम अहीर ने कराया था। लेकिन अब यह तालाब सूख चुका है।
बड़ा तालाब
बड़ा तालाब को राव तेज सिंह तालाब के नाम से भी जाना जाता है। यह रेवाड़ी के टाउन हॉल के पास स्थित है। इसका निर्माण राव तेज सिंह ने 1810-1815 ईण्. में कराया था। तालाब में पानी की आपूर्ति वर्षा के पानी और भूमिगत जलधाराओं द्वारा होती है। यहां महिलाओं और पुरूषों के स्नान करने के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई है। तालाब के पास हनुमान मन्दिर स्थित है। पर्यटकों और श्रद्धालुओं में यह मन्दिर बहुत लोकप्रिय है।
हनुमान मंदिर की प्राचीन मंदिर
अठारहवीं सदी में बने विशाल तालाब तेज सरोवर पर बाबा हनुमान का प्राचीन मंदिर स्थित है। देखने में तो यह मंदिर केवल डेढ़ सौ वर्ग गज भूमि पर बना है लेकिन वीर हनुमान की अपार कृपा के कारण यहां मंदिर परिसर में रोजाना भक्तजनों का जमावड़ा लगा रहता है। मंदिर की प्राचीनता तेज सरोवर के समान है। मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा, आस्था और विश्वास की त्रिवेणी की बात करें तो यहां न केवल आस-पास के श्रद्धालु ही पूजा-अर्चना करने और मुराद मांगने आते हैं बल्कि दूसरे राज्यों से भी लोग मंदिर में हनुमान के दर्शनार्थ आते हैं।
माना जाता है कि पवनपुत्र हनुमान का भक्त राजस्थान से दिल्ली हनुमान की मूर्ति बैलगाड़ी में रखकर ले जा रहा था। वह भक्त रेवाड़ी के तेज सरोवर पर पहुंचा तो आराम करने के बाद जब वह जाने लगा तो बैलगाड़ी टस से मस भी नहीं हुई। उसने बैलों को खूब पीटा पर बैल हिले तक नहींए तब उस श्रद्धालु ने हनुमान की मर्जी जानकर यहीं पर मूर्ति को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक रामभक्त हनुमान की यह मूर्ति आस्था का केंद्र बनी हुई है। श्रद्धा, आस्था और विश्वास की त्रिवेणी के निरंतर बहने के कारण ही बड़ के नीचे स्थापित मूर्ति के स्थान पर आज एक सुंदर मंदिर विराजमान है। मूर्ति स्थापना से लेकर आज तक इस मंदिर की रेख-देख महंत परिवार करता आ रहा है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर में हनुमान की दो मूर्तियां हैं। यदि छोटी वाली मूर्ति के अंगूठे पर किसी भक्त द्वारा चढ़ाया गया गोला-कुंजा ठहर गया तो समझो उसकी नैया बजरंगी अवश्य पार लगाते हैं। इसके अलावा सिंदूर भी चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि बूंदी का प्रसाद और गोले-कुंजे आदि को भक्तिभाव से ओत-प्रोत होकर हनुमान की मूर्ति पर चढ़ाकर जो मन्नत मांगता है तो बाबा उसे खाली हाथ नहीं जाने देते। इसलिए हर मंगलवार बड़े तालाब पर स्थित हनुमान मंदिर में दूर-दूर से भक्तजन आकर प्रसाद ओर ध्वजा चढ़ाते हैं। इस प्राचीन मंदिर में हरियाणा के अलावा दिल्ली, पंजाब, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और आंध्रप्रदेश के साथ-साथ दुबई, जापान और अमेरिका से भी भक्तजन मन्नत मांगने आते हैं। मंदिर में मंगलवार को भजन-कीर्तन और भंडारा होता है जबकि हर रविवार को रामायण पाठ होता है। सबसे मनोहारी दृश्य तो हनुमान जयंती के अवसर पर होता है। बाबा की सुंदर झांकी निकाली जाती है।
घंटेश्वर मन्दिर
यह रेवाड़ी का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह मंदिर शहर के बीचोंबीच स्थित है। पर्यटक इस मन्दिर में सनातन धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के दर्शन सकते हैं। यह तीन मंजिला इमारत है और बहुत खूबसूरत है। श्रद्धालु प्रतिदिन इस मन्दिर में पूजा करने आते हैं।
कैसे जाएं
वायु मार्ग
हवाई जहाज द्वारा भी पर्यटक आसानी से रेवाड़ी तक पहुंच सकते हैं। दिल्ली का इंदिरा गांधी अन्र्तराष्ट्रीय हवाई अड्डा रेवाड़ी से मात्र 80 किमी. की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग
रेवाड़ी पहुंचने के लिए रेलमार्ग भी काफी अच्छा विकल्प है। पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां पर रेलवे स्टेशन का निर्माण किया गया है।
सड़क मार्ग
दिल्ली.जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 8 द्वारा पर्यटक आसानी से रेवाड़ी तक पहुंच सकते हैं।
आधुनिक रेवाड़ी की स्थापना 1 नवम्बर 1989 ई. में की गई। इसके उत्तर में रोहतक, पश्चिम में महेन्द्रगढ़, पूर्व में गुडग़ांव और दक्षिण-पूर्व में राजस्थान का अल्वर स्थित है। हाल के दिनों में रेवाड़ी का जबरदस्त विकास हुआ है। विशेष तौर पर इसके धारूहेड़ा क्षेत्र में कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की स्थापना की गई हैं। इन कम्पनियों में इण्डो निशीयन फूड्स लिमिटेड, सोनी इण्डिया लिमिटेड, अशाही इण्डिया और दुपहिया वाहन बनाने वाली विश्व की सबसे बड़ी कम्पनी हीरो होंडा प्रमुख हैं। रेवाड़ी में क्या देखें लाल मस्जिद
रेवाड़ी का लाल मस्जिद पर्यटकों को अपने ओर आकर्षित करता है। यह मस्जिद रेवाड़ी की अदालत के पास स्थित है। यह मस्जिद बहुत खूबसूरत है और इसे देखने के लिए पर्यटक दूर-दूर से यहां आते हैं। इसका निर्माण अकबर के शासनकाल में 1570 ई. में किया गया था। मस्जिद के पास दो खूबसूरत दर्शनीय स्थल भी हैं। पर्यटक चाहें तो इनकी सैर के लिए जा सकते हैं।
बाग वाला तालाब
यह तालाब पुरानी तहसील के पास स्थित है। इसका निर्माण राव गुर्जर के पुत्र राम अहीर ने कराया था। लेकिन अब यह तालाब सूख चुका है।
बड़ा तालाब
बड़ा तालाब को राव तेज सिंह तालाब के नाम से भी जाना जाता है। यह रेवाड़ी के टाउन हॉल के पास स्थित है। इसका निर्माण राव तेज सिंह ने 1810-1815 ईण्. में कराया था। तालाब में पानी की आपूर्ति वर्षा के पानी और भूमिगत जलधाराओं द्वारा होती है। यहां महिलाओं और पुरूषों के स्नान करने के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई है। तालाब के पास हनुमान मन्दिर स्थित है। पर्यटकों और श्रद्धालुओं में यह मन्दिर बहुत लोकप्रिय है।
हनुमान मंदिर की प्राचीन मंदिर
अठारहवीं सदी में बने विशाल तालाब तेज सरोवर पर बाबा हनुमान का प्राचीन मंदिर स्थित है। देखने में तो यह मंदिर केवल डेढ़ सौ वर्ग गज भूमि पर बना है लेकिन वीर हनुमान की अपार कृपा के कारण यहां मंदिर परिसर में रोजाना भक्तजनों का जमावड़ा लगा रहता है। मंदिर की प्राचीनता तेज सरोवर के समान है। मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा, आस्था और विश्वास की त्रिवेणी की बात करें तो यहां न केवल आस-पास के श्रद्धालु ही पूजा-अर्चना करने और मुराद मांगने आते हैं बल्कि दूसरे राज्यों से भी लोग मंदिर में हनुमान के दर्शनार्थ आते हैं।
माना जाता है कि पवनपुत्र हनुमान का भक्त राजस्थान से दिल्ली हनुमान की मूर्ति बैलगाड़ी में रखकर ले जा रहा था। वह भक्त रेवाड़ी के तेज सरोवर पर पहुंचा तो आराम करने के बाद जब वह जाने लगा तो बैलगाड़ी टस से मस भी नहीं हुई। उसने बैलों को खूब पीटा पर बैल हिले तक नहींए तब उस श्रद्धालु ने हनुमान की मर्जी जानकर यहीं पर मूर्ति को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक रामभक्त हनुमान की यह मूर्ति आस्था का केंद्र बनी हुई है। श्रद्धा, आस्था और विश्वास की त्रिवेणी के निरंतर बहने के कारण ही बड़ के नीचे स्थापित मूर्ति के स्थान पर आज एक सुंदर मंदिर विराजमान है। मूर्ति स्थापना से लेकर आज तक इस मंदिर की रेख-देख महंत परिवार करता आ रहा है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर में हनुमान की दो मूर्तियां हैं। यदि छोटी वाली मूर्ति के अंगूठे पर किसी भक्त द्वारा चढ़ाया गया गोला-कुंजा ठहर गया तो समझो उसकी नैया बजरंगी अवश्य पार लगाते हैं। इसके अलावा सिंदूर भी चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि बूंदी का प्रसाद और गोले-कुंजे आदि को भक्तिभाव से ओत-प्रोत होकर हनुमान की मूर्ति पर चढ़ाकर जो मन्नत मांगता है तो बाबा उसे खाली हाथ नहीं जाने देते। इसलिए हर मंगलवार बड़े तालाब पर स्थित हनुमान मंदिर में दूर-दूर से भक्तजन आकर प्रसाद ओर ध्वजा चढ़ाते हैं। इस प्राचीन मंदिर में हरियाणा के अलावा दिल्ली, पंजाब, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और आंध्रप्रदेश के साथ-साथ दुबई, जापान और अमेरिका से भी भक्तजन मन्नत मांगने आते हैं। मंदिर में मंगलवार को भजन-कीर्तन और भंडारा होता है जबकि हर रविवार को रामायण पाठ होता है। सबसे मनोहारी दृश्य तो हनुमान जयंती के अवसर पर होता है। बाबा की सुंदर झांकी निकाली जाती है।
घंटेश्वर मन्दिर
यह रेवाड़ी का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह मंदिर शहर के बीचोंबीच स्थित है। पर्यटक इस मन्दिर में सनातन धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के दर्शन सकते हैं। यह तीन मंजिला इमारत है और बहुत खूबसूरत है। श्रद्धालु प्रतिदिन इस मन्दिर में पूजा करने आते हैं।
कैसे जाएं
वायु मार्ग
हवाई जहाज द्वारा भी पर्यटक आसानी से रेवाड़ी तक पहुंच सकते हैं। दिल्ली का इंदिरा गांधी अन्र्तराष्ट्रीय हवाई अड्डा रेवाड़ी से मात्र 80 किमी. की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग
रेवाड़ी पहुंचने के लिए रेलमार्ग भी काफी अच्छा विकल्प है। पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां पर रेलवे स्टेशन का निर्माण किया गया है।
सड़क मार्ग
दिल्ली.जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 8 द्वारा पर्यटक आसानी से रेवाड़ी तक पहुंच सकते हैं।
Saturday, 5 January 2013
धान का कटोरा रोहतास
रोहतास अत्यंत ही मनोरम और रमणीक स्थल के लिए विख्यात है। धान के कटोरे के रूप में बिहार के मानचित्र पर रोतहास की पहचान है। इसका जिला मुख्यालय सासाराम है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह स्थान काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। मगध, अफगान, शेर शाह और कई अन्य शासकों ने इस जगह पर शासन किया था। पहले रोहतास शाहबाद जिले का एक हिस्सा था। लेकिन 1972 ई. में इस जिले को स्वतंत्र रूप से जिले के रूप में पहचान मिली। रोहतास का इतिहास पर्यटकों को काफी आकर्षित करता है। यहां आकर आपको लगेगा कि आप यही के हो जाए। रोहतास भोजपुर और बक्सर जिला के उत्तर, पलामू और गरवा जिले के दक्षिण, गया जिले के पूर्व तथा कैमूर जिले के पश्चिम से घिरा हुआ है।
क्या देखें
रोहतास गढ़
जिला मुख्यालय के पश्चिम से ५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दंतकथाओं के अनुसार, इस जगह का नाम राजा हरिशचन्द्र के पुत्र रोहितासव के नाम पर रखा लिखा गया था। रोहितासव ने यहां पर एक किले का निर्माण करवाया था। यहां के स्थानीय लोगों का मानना है कि रोहतास का अर्थ शुष्क भूमि होता है। रोहतास में एक विशाल किला है। शेरशाह ने रोहतासव के किले को 1538 ई. में कब्जाया था। यह अकबरपुर का जिला मुख्यालय है। यहां पर मोहम्मदन संत शेख शाह बाबल की मजार भी है। रोहतास किले के उत्तर से एक किलोमीटर की दूरी पर बावन तालाब है। यह काफी प्राचीन मंदिरों में से है। पुराने समय में इस गांव के चारों ओर 52 कुंड थे। लेकिन वर्तमान समय में इस प्रकार का कोई तथ्य नहीं मिलता है। यहां पर एक प्राचीन शिव मंदिर भी है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा हरिश्चन्द्र ने करवाया था। इस मंदिर को चौरासन मंदिर के नाम से जाना जाता है। सासाराम सासाराम रोहतास जिले का मुख्यालय है। सासाराम ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। शहर के समीप ही कई स्मारक है। यहीं पर स्थित है शेरशाह का मकबरा जो काफी प्रसिद्ध है। यह मकबरा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मकबरे पर हुई वास्तुकला काफी खूबसूरत है जो काफी संख्या में पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। इसके देखने के लिए देश-विदेश के हजारों पर्यटक आते हैं। इस मकबरे का निर्माण शेर शाह ने सोलहवीं शताब्दी के मध्य में करवाया था। पत्थरों से बना यह मकबरा विशाल कुंड के मध्य स्थित भारत का दूसरा ऊंचा मकबरा है। इस मकबरे को सूखा रोजा के नाम से भी जाना जाता हे। साराराम के समीप पर्वत पर स्थित चांद-तान-पीर पर अशोक अभिलेख मौजूद है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
अकबरपुर
रोहतास के किले से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित कैमूर पर्वत में यह जगह स्थित है। कहा जाता है कि इस जगह का नाम मुगल शासक अकबर के नाम पर रखा गया है। यह जगह रोहतास जिला मुख्यालय के काफी समीप स्थित है। इस जगह पर शासक शाहजहां के समय के मलिक विसहाल खान का मकबरा है। मलिक विसहाल खान रोहतास गढ़ के दारोगा थे।
याकशिनी भगवती
यहां पर देवी दुर्गा का प्रसिद्ध मंदिर है। इन्हें याकशिनी भगवती के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर भगवान शिराक भानखंडी महादेवन का प्राचीन मंदिर भी है। यह मंदिर दिनार खण्ड के पूर्व से सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। काफी संख्या में श्रद्धालु देवी मां से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मंदिर में आते हैं।
शेरगढ़
चैनारी के दक्षिण से 13 किलोमीटर की दूरी पर शेरगढ़ स्थित है। शेर शाह के शासन के दौरान यह सैनिक छावनी था। यहां पर एक किला है जो वर्तमान समय में पूरी तरह से विध्वंस हो चुका है।
कैसे पहुंचे रोहतास
वायु मार्ग
सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। राजधानी पटना से रोहतास 147 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अतिरिक्त गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा द्वारा भी रोहतास पहुंच सकते हैं। गया से रोहतास लगभग 125 किलोमीटर की दूरी पर है।
रेल मार्ग
यहां आप रेलमार्ग से भी आ सकते हैं। रोहतास रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से पहुंचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन सासाराम स्थित है।
सड़क मार्ग
भारत के कई प्रमुख शहरों से रोहतास सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
क्या देखें
रोहतास गढ़
जिला मुख्यालय के पश्चिम से ५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दंतकथाओं के अनुसार, इस जगह का नाम राजा हरिशचन्द्र के पुत्र रोहितासव के नाम पर रखा लिखा गया था। रोहितासव ने यहां पर एक किले का निर्माण करवाया था। यहां के स्थानीय लोगों का मानना है कि रोहतास का अर्थ शुष्क भूमि होता है। रोहतास में एक विशाल किला है। शेरशाह ने रोहतासव के किले को 1538 ई. में कब्जाया था। यह अकबरपुर का जिला मुख्यालय है। यहां पर मोहम्मदन संत शेख शाह बाबल की मजार भी है। रोहतास किले के उत्तर से एक किलोमीटर की दूरी पर बावन तालाब है। यह काफी प्राचीन मंदिरों में से है। पुराने समय में इस गांव के चारों ओर 52 कुंड थे। लेकिन वर्तमान समय में इस प्रकार का कोई तथ्य नहीं मिलता है। यहां पर एक प्राचीन शिव मंदिर भी है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा हरिश्चन्द्र ने करवाया था। इस मंदिर को चौरासन मंदिर के नाम से जाना जाता है। सासाराम सासाराम रोहतास जिले का मुख्यालय है। सासाराम ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। शहर के समीप ही कई स्मारक है। यहीं पर स्थित है शेरशाह का मकबरा जो काफी प्रसिद्ध है। यह मकबरा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मकबरे पर हुई वास्तुकला काफी खूबसूरत है जो काफी संख्या में पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। इसके देखने के लिए देश-विदेश के हजारों पर्यटक आते हैं। इस मकबरे का निर्माण शेर शाह ने सोलहवीं शताब्दी के मध्य में करवाया था। पत्थरों से बना यह मकबरा विशाल कुंड के मध्य स्थित भारत का दूसरा ऊंचा मकबरा है। इस मकबरे को सूखा रोजा के नाम से भी जाना जाता हे। साराराम के समीप पर्वत पर स्थित चांद-तान-पीर पर अशोक अभिलेख मौजूद है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
अकबरपुर
रोहतास के किले से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित कैमूर पर्वत में यह जगह स्थित है। कहा जाता है कि इस जगह का नाम मुगल शासक अकबर के नाम पर रखा गया है। यह जगह रोहतास जिला मुख्यालय के काफी समीप स्थित है। इस जगह पर शासक शाहजहां के समय के मलिक विसहाल खान का मकबरा है। मलिक विसहाल खान रोहतास गढ़ के दारोगा थे।
याकशिनी भगवती
यहां पर देवी दुर्गा का प्रसिद्ध मंदिर है। इन्हें याकशिनी भगवती के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर भगवान शिराक भानखंडी महादेवन का प्राचीन मंदिर भी है। यह मंदिर दिनार खण्ड के पूर्व से सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। काफी संख्या में श्रद्धालु देवी मां से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मंदिर में आते हैं।
शेरगढ़
चैनारी के दक्षिण से 13 किलोमीटर की दूरी पर शेरगढ़ स्थित है। शेर शाह के शासन के दौरान यह सैनिक छावनी था। यहां पर एक किला है जो वर्तमान समय में पूरी तरह से विध्वंस हो चुका है।
कैसे पहुंचे रोहतास
वायु मार्ग
सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। राजधानी पटना से रोहतास 147 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अतिरिक्त गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा द्वारा भी रोहतास पहुंच सकते हैं। गया से रोहतास लगभग 125 किलोमीटर की दूरी पर है।
रेल मार्ग
यहां आप रेलमार्ग से भी आ सकते हैं। रोहतास रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से पहुंचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन सासाराम स्थित है।
सड़क मार्ग
भारत के कई प्रमुख शहरों से रोहतास सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
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