Sunday, 20 January 2013
अम्बा वाला अर्थात अम्बाला
हरियाणा में स्थित अम्बाला बहुत खूबसूरत स्थान है। कहा जाता है कि अम्बाला की स्थापना अम्बा राजपूतों ने 14वीं शताब्दी में की थी। अम्बाला शहर भारत के हरियाणा राज्य का एक मुख्य एवं ऐतिहासिक शहर है। यह भारत की राजधानी दिल्ली से दो सौ किलो मीटर उत्तर की ओर शेरशाह सूरी मार्ग(राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 1) पर स्थित है। अंबाला छावनी एक प्रमुख रेलवे जंक्शन है। अंबाला जिला हरियाणा एंव पंजाब राज्यों की सीमा पर स्थित है। अंबाला छावनी देश का प्रमुख सैन्य आगार है। भौगोलिक स्थिति के कारण पर्यट्न के क्षेत्र में भी अंबाला का मह्त्वपूर्ण योगदान है।
अम्बाला नाम की उत्पत्ति शायद महाभारत की अम्बालिका के नाम से हुई होगी। आज के जमाने में अम्बाला अपने विज्ञान सामग्री उत्पादन व मिक्सी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। अम्बाला को विज्ञान नगरी कह कर भी पुकारा जाता है कयोंकि यहां वैज्ञानिक उपकरण उद्योग केंद्रित है। भारत के वैज्ञानिक उपकरणों का लगभग चालीस प्रतिशत उत्पादन अम्बाला में ही होता है। एक अन्य मत यह भी है कि यहां पर आमों के बाग बगीचे बहुत थे, जिससे इस का नाम अम्बा वाला अर्थात अम्बाला पड़ गया। इसके पास आमों की खेती की जाती है। बइन इकाईयों में धातु तैयार करने वालीए रसोईघर में काम आने वाले उपकरण बनाने वाली और पानी के पम्प बनाने वाली इकाईयां प्रमुख हैं।
इसके पास ही बराड़ा, नागल, मुलाणा, साहा और शहजादपुर आदि शहर भी हैं। पर्यटक चाहें तो इन शहरों में भी घूमने जा सकते हैं। इसके दक्षिण-पूर्व में यमुनानगर, दक्षिण में कुरूक्षेत्र और पश्चिम में पटियाला व रोपड़ स्थित हैं। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 900 फीट है। यह धार्मिक पर्यटन स्थलों से भरा पड़ा है। पर्यटक चाहें तो इन पर्यटक स्थलों की यात्रा पर जा सकते हैं।
पर्यटक यहां क्या देखें
अम्बाला अपने धार्मिक तीर्थस्थलों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। इन स्थलों में मन्दिर, गुरूद्वारे, चर्च और दरगाह-मस्जिदें प्रमुख हैं। पर्यटक यहां पर हिन्दुओं की देवी भवानी का मन्दिर देख सकते हैं। इस मन्दिर का नाम भवानी अम्बा है। मन्दिर देखने के बाद पर्यटक गुरूद्वारे देख सकते हैं। बादशाही बाग गुरूद्वारा, शीशगंज गुरूद्वारा, मंजी साहिब गुरूद्वारा और संगत साहिब गुरूद्वारा यहां के प्रमुख गुरूद्वारे हैं। सिक्ख गुरूओं गुरू गोबिंद सिंह, गुरू तेगबहादुर और गुरू हरगोबिंद सिंह का भी इन गुरूद्वारों से संबंध रहा है। गुरूद्वारों के अलावा यहां का लखीशाह, तैक्वाल शाह और सेंट पॉल चर्च भी पर्यटकों को बहुत पसंद आते हैं। चर्च के पास ही एक कब्रिस्तान भी है।
यह सब देखने के बाद पर्यटक अम्बाला कैंट में स्थित पटेल पार्क और अम्बाला शहर का सिटी पार्क घूमने जा सकते हैं। इन बगीचों के पास बुरिया में रंगमहल भी है। यह महल बहुत खूबसूरत है। इस महल की आर्क, स्तम्भ और नक्काशी पर्यटकों को बहुत पसंद आती है। इसका निर्माण शाहजहां के शासनकाल में किया गया था।
गुरुदवारा श्री बादशाही बाग साहिब : अम्बाला शहर में सथित है। गुरुदवारा साहिब हिसार को जाने वाली सड़क के पास सथित है। इस अस्थान पर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज फागुन की पूरनमाशी को आए थे। गुरु साहिब के साथ मामा कृपाल चंद जीए कई सिख, नीला घोड़ा तथा सफ़ेद बाज़ था। गुरु साहिब लखनोर से शिकार खेलते हुए यहाँ आए। शहर का पीर अमीर दीन अपने बाग़ में बाज़ लेकर खड़ा था। जब उसने गुरु साहिब का सफ़ेद बाज़ देखा तो पीर का मन बेईमान हो गया द्य उसने गुरु साहिब को कहा कि मेरे बाज़ के साथ अपने बाज़ को लड़वाओ, गुरु साहिब अन्तर्यामी थे, समझ गए कि पीर नीती से बाज़ लेना चाहता है।
Wednesday, 16 January 2013
हरियाणा यात्रा : वैभवशाली आकर्षक रेवाड़ी
हरियाणा के रेवाड़ी का अतीत बड़ा वैभवशाली रहा है। यह प्राचीन शहर अपने आंचल में स्वर्णिम अतीत समेटे हुए है। यह नगर प्राचीनकाल में न केवल राजनैतिक बल्कि कला, साहित्य, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा है। यहां पर हेमू की हवेली, राव तुलाराम का महल, रानी की ड्योढ़ी, तेज सरोवर, हनुमान मंदिर एवं घंटेश्वर मंदिर आदि रेवाड़ी की प्राचीन भव्यता एवं स्वर्णिम इतिहास के साक्षी हैं। यह दिल्ली से मात्र 80 किमी. की दूरी पर स्थित है। महाभारत के अनुसार यह माना जाता है कि पहले यहां पर रेवात नामक राजा का राज था। उसकी पुत्री का नाम रेवती था। वह उसे प्यार से रेवा पुकारता था। उसी के नाम पर उसने इसका नरम रेवा वाड़ी रखा था। बाद में इसका नाम रेवा वाड़ी से बदलकर रेवाड़ी हो गया।
आधुनिक रेवाड़ी की स्थापना 1 नवम्बर 1989 ई. में की गई। इसके उत्तर में रोहतक, पश्चिम में महेन्द्रगढ़, पूर्व में गुडग़ांव और दक्षिण-पूर्व में राजस्थान का अल्वर स्थित है। हाल के दिनों में रेवाड़ी का जबरदस्त विकास हुआ है। विशेष तौर पर इसके धारूहेड़ा क्षेत्र में कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की स्थापना की गई हैं। इन कम्पनियों में इण्डो निशीयन फूड्स लिमिटेड, सोनी इण्डिया लिमिटेड, अशाही इण्डिया और दुपहिया वाहन बनाने वाली विश्व की सबसे बड़ी कम्पनी हीरो होंडा प्रमुख हैं। रेवाड़ी में क्या देखें लाल मस्जिद
रेवाड़ी का लाल मस्जिद पर्यटकों को अपने ओर आकर्षित करता है। यह मस्जिद रेवाड़ी की अदालत के पास स्थित है। यह मस्जिद बहुत खूबसूरत है और इसे देखने के लिए पर्यटक दूर-दूर से यहां आते हैं। इसका निर्माण अकबर के शासनकाल में 1570 ई. में किया गया था। मस्जिद के पास दो खूबसूरत दर्शनीय स्थल भी हैं। पर्यटक चाहें तो इनकी सैर के लिए जा सकते हैं।
बाग वाला तालाब
यह तालाब पुरानी तहसील के पास स्थित है। इसका निर्माण राव गुर्जर के पुत्र राम अहीर ने कराया था। लेकिन अब यह तालाब सूख चुका है।
बड़ा तालाब
बड़ा तालाब को राव तेज सिंह तालाब के नाम से भी जाना जाता है। यह रेवाड़ी के टाउन हॉल के पास स्थित है। इसका निर्माण राव तेज सिंह ने 1810-1815 ईण्. में कराया था। तालाब में पानी की आपूर्ति वर्षा के पानी और भूमिगत जलधाराओं द्वारा होती है। यहां महिलाओं और पुरूषों के स्नान करने के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई है। तालाब के पास हनुमान मन्दिर स्थित है। पर्यटकों और श्रद्धालुओं में यह मन्दिर बहुत लोकप्रिय है।
हनुमान मंदिर की प्राचीन मंदिर
अठारहवीं सदी में बने विशाल तालाब तेज सरोवर पर बाबा हनुमान का प्राचीन मंदिर स्थित है। देखने में तो यह मंदिर केवल डेढ़ सौ वर्ग गज भूमि पर बना है लेकिन वीर हनुमान की अपार कृपा के कारण यहां मंदिर परिसर में रोजाना भक्तजनों का जमावड़ा लगा रहता है। मंदिर की प्राचीनता तेज सरोवर के समान है। मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा, आस्था और विश्वास की त्रिवेणी की बात करें तो यहां न केवल आस-पास के श्रद्धालु ही पूजा-अर्चना करने और मुराद मांगने आते हैं बल्कि दूसरे राज्यों से भी लोग मंदिर में हनुमान के दर्शनार्थ आते हैं।
माना जाता है कि पवनपुत्र हनुमान का भक्त राजस्थान से दिल्ली हनुमान की मूर्ति बैलगाड़ी में रखकर ले जा रहा था। वह भक्त रेवाड़ी के तेज सरोवर पर पहुंचा तो आराम करने के बाद जब वह जाने लगा तो बैलगाड़ी टस से मस भी नहीं हुई। उसने बैलों को खूब पीटा पर बैल हिले तक नहींए तब उस श्रद्धालु ने हनुमान की मर्जी जानकर यहीं पर मूर्ति को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक रामभक्त हनुमान की यह मूर्ति आस्था का केंद्र बनी हुई है। श्रद्धा, आस्था और विश्वास की त्रिवेणी के निरंतर बहने के कारण ही बड़ के नीचे स्थापित मूर्ति के स्थान पर आज एक सुंदर मंदिर विराजमान है। मूर्ति स्थापना से लेकर आज तक इस मंदिर की रेख-देख महंत परिवार करता आ रहा है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर में हनुमान की दो मूर्तियां हैं। यदि छोटी वाली मूर्ति के अंगूठे पर किसी भक्त द्वारा चढ़ाया गया गोला-कुंजा ठहर गया तो समझो उसकी नैया बजरंगी अवश्य पार लगाते हैं। इसके अलावा सिंदूर भी चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि बूंदी का प्रसाद और गोले-कुंजे आदि को भक्तिभाव से ओत-प्रोत होकर हनुमान की मूर्ति पर चढ़ाकर जो मन्नत मांगता है तो बाबा उसे खाली हाथ नहीं जाने देते। इसलिए हर मंगलवार बड़े तालाब पर स्थित हनुमान मंदिर में दूर-दूर से भक्तजन आकर प्रसाद ओर ध्वजा चढ़ाते हैं। इस प्राचीन मंदिर में हरियाणा के अलावा दिल्ली, पंजाब, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और आंध्रप्रदेश के साथ-साथ दुबई, जापान और अमेरिका से भी भक्तजन मन्नत मांगने आते हैं। मंदिर में मंगलवार को भजन-कीर्तन और भंडारा होता है जबकि हर रविवार को रामायण पाठ होता है। सबसे मनोहारी दृश्य तो हनुमान जयंती के अवसर पर होता है। बाबा की सुंदर झांकी निकाली जाती है।
घंटेश्वर मन्दिर
यह रेवाड़ी का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह मंदिर शहर के बीचोंबीच स्थित है। पर्यटक इस मन्दिर में सनातन धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के दर्शन सकते हैं। यह तीन मंजिला इमारत है और बहुत खूबसूरत है। श्रद्धालु प्रतिदिन इस मन्दिर में पूजा करने आते हैं।
कैसे जाएं
वायु मार्ग
हवाई जहाज द्वारा भी पर्यटक आसानी से रेवाड़ी तक पहुंच सकते हैं। दिल्ली का इंदिरा गांधी अन्र्तराष्ट्रीय हवाई अड्डा रेवाड़ी से मात्र 80 किमी. की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग
रेवाड़ी पहुंचने के लिए रेलमार्ग भी काफी अच्छा विकल्प है। पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां पर रेलवे स्टेशन का निर्माण किया गया है।
सड़क मार्ग
दिल्ली.जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 8 द्वारा पर्यटक आसानी से रेवाड़ी तक पहुंच सकते हैं।
आधुनिक रेवाड़ी की स्थापना 1 नवम्बर 1989 ई. में की गई। इसके उत्तर में रोहतक, पश्चिम में महेन्द्रगढ़, पूर्व में गुडग़ांव और दक्षिण-पूर्व में राजस्थान का अल्वर स्थित है। हाल के दिनों में रेवाड़ी का जबरदस्त विकास हुआ है। विशेष तौर पर इसके धारूहेड़ा क्षेत्र में कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की स्थापना की गई हैं। इन कम्पनियों में इण्डो निशीयन फूड्स लिमिटेड, सोनी इण्डिया लिमिटेड, अशाही इण्डिया और दुपहिया वाहन बनाने वाली विश्व की सबसे बड़ी कम्पनी हीरो होंडा प्रमुख हैं। रेवाड़ी में क्या देखें लाल मस्जिद
रेवाड़ी का लाल मस्जिद पर्यटकों को अपने ओर आकर्षित करता है। यह मस्जिद रेवाड़ी की अदालत के पास स्थित है। यह मस्जिद बहुत खूबसूरत है और इसे देखने के लिए पर्यटक दूर-दूर से यहां आते हैं। इसका निर्माण अकबर के शासनकाल में 1570 ई. में किया गया था। मस्जिद के पास दो खूबसूरत दर्शनीय स्थल भी हैं। पर्यटक चाहें तो इनकी सैर के लिए जा सकते हैं।
बाग वाला तालाब
यह तालाब पुरानी तहसील के पास स्थित है। इसका निर्माण राव गुर्जर के पुत्र राम अहीर ने कराया था। लेकिन अब यह तालाब सूख चुका है।
बड़ा तालाब
बड़ा तालाब को राव तेज सिंह तालाब के नाम से भी जाना जाता है। यह रेवाड़ी के टाउन हॉल के पास स्थित है। इसका निर्माण राव तेज सिंह ने 1810-1815 ईण्. में कराया था। तालाब में पानी की आपूर्ति वर्षा के पानी और भूमिगत जलधाराओं द्वारा होती है। यहां महिलाओं और पुरूषों के स्नान करने के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई है। तालाब के पास हनुमान मन्दिर स्थित है। पर्यटकों और श्रद्धालुओं में यह मन्दिर बहुत लोकप्रिय है।
हनुमान मंदिर की प्राचीन मंदिर
अठारहवीं सदी में बने विशाल तालाब तेज सरोवर पर बाबा हनुमान का प्राचीन मंदिर स्थित है। देखने में तो यह मंदिर केवल डेढ़ सौ वर्ग गज भूमि पर बना है लेकिन वीर हनुमान की अपार कृपा के कारण यहां मंदिर परिसर में रोजाना भक्तजनों का जमावड़ा लगा रहता है। मंदिर की प्राचीनता तेज सरोवर के समान है। मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा, आस्था और विश्वास की त्रिवेणी की बात करें तो यहां न केवल आस-पास के श्रद्धालु ही पूजा-अर्चना करने और मुराद मांगने आते हैं बल्कि दूसरे राज्यों से भी लोग मंदिर में हनुमान के दर्शनार्थ आते हैं।
माना जाता है कि पवनपुत्र हनुमान का भक्त राजस्थान से दिल्ली हनुमान की मूर्ति बैलगाड़ी में रखकर ले जा रहा था। वह भक्त रेवाड़ी के तेज सरोवर पर पहुंचा तो आराम करने के बाद जब वह जाने लगा तो बैलगाड़ी टस से मस भी नहीं हुई। उसने बैलों को खूब पीटा पर बैल हिले तक नहींए तब उस श्रद्धालु ने हनुमान की मर्जी जानकर यहीं पर मूर्ति को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक रामभक्त हनुमान की यह मूर्ति आस्था का केंद्र बनी हुई है। श्रद्धा, आस्था और विश्वास की त्रिवेणी के निरंतर बहने के कारण ही बड़ के नीचे स्थापित मूर्ति के स्थान पर आज एक सुंदर मंदिर विराजमान है। मूर्ति स्थापना से लेकर आज तक इस मंदिर की रेख-देख महंत परिवार करता आ रहा है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर में हनुमान की दो मूर्तियां हैं। यदि छोटी वाली मूर्ति के अंगूठे पर किसी भक्त द्वारा चढ़ाया गया गोला-कुंजा ठहर गया तो समझो उसकी नैया बजरंगी अवश्य पार लगाते हैं। इसके अलावा सिंदूर भी चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि बूंदी का प्रसाद और गोले-कुंजे आदि को भक्तिभाव से ओत-प्रोत होकर हनुमान की मूर्ति पर चढ़ाकर जो मन्नत मांगता है तो बाबा उसे खाली हाथ नहीं जाने देते। इसलिए हर मंगलवार बड़े तालाब पर स्थित हनुमान मंदिर में दूर-दूर से भक्तजन आकर प्रसाद ओर ध्वजा चढ़ाते हैं। इस प्राचीन मंदिर में हरियाणा के अलावा दिल्ली, पंजाब, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और आंध्रप्रदेश के साथ-साथ दुबई, जापान और अमेरिका से भी भक्तजन मन्नत मांगने आते हैं। मंदिर में मंगलवार को भजन-कीर्तन और भंडारा होता है जबकि हर रविवार को रामायण पाठ होता है। सबसे मनोहारी दृश्य तो हनुमान जयंती के अवसर पर होता है। बाबा की सुंदर झांकी निकाली जाती है।
घंटेश्वर मन्दिर
यह रेवाड़ी का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह मंदिर शहर के बीचोंबीच स्थित है। पर्यटक इस मन्दिर में सनातन धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के दर्शन सकते हैं। यह तीन मंजिला इमारत है और बहुत खूबसूरत है। श्रद्धालु प्रतिदिन इस मन्दिर में पूजा करने आते हैं।
कैसे जाएं
वायु मार्ग
हवाई जहाज द्वारा भी पर्यटक आसानी से रेवाड़ी तक पहुंच सकते हैं। दिल्ली का इंदिरा गांधी अन्र्तराष्ट्रीय हवाई अड्डा रेवाड़ी से मात्र 80 किमी. की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग
रेवाड़ी पहुंचने के लिए रेलमार्ग भी काफी अच्छा विकल्प है। पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां पर रेलवे स्टेशन का निर्माण किया गया है।
सड़क मार्ग
दिल्ली.जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 8 द्वारा पर्यटक आसानी से रेवाड़ी तक पहुंच सकते हैं।
Saturday, 5 January 2013
धान का कटोरा रोहतास
रोहतास अत्यंत ही मनोरम और रमणीक स्थल के लिए विख्यात है। धान के कटोरे के रूप में बिहार के मानचित्र पर रोतहास की पहचान है। इसका जिला मुख्यालय सासाराम है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह स्थान काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। मगध, अफगान, शेर शाह और कई अन्य शासकों ने इस जगह पर शासन किया था। पहले रोहतास शाहबाद जिले का एक हिस्सा था। लेकिन 1972 ई. में इस जिले को स्वतंत्र रूप से जिले के रूप में पहचान मिली। रोहतास का इतिहास पर्यटकों को काफी आकर्षित करता है। यहां आकर आपको लगेगा कि आप यही के हो जाए। रोहतास भोजपुर और बक्सर जिला के उत्तर, पलामू और गरवा जिले के दक्षिण, गया जिले के पूर्व तथा कैमूर जिले के पश्चिम से घिरा हुआ है।
क्या देखें
रोहतास गढ़
जिला मुख्यालय के पश्चिम से ५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दंतकथाओं के अनुसार, इस जगह का नाम राजा हरिशचन्द्र के पुत्र रोहितासव के नाम पर रखा लिखा गया था। रोहितासव ने यहां पर एक किले का निर्माण करवाया था। यहां के स्थानीय लोगों का मानना है कि रोहतास का अर्थ शुष्क भूमि होता है। रोहतास में एक विशाल किला है। शेरशाह ने रोहतासव के किले को 1538 ई. में कब्जाया था। यह अकबरपुर का जिला मुख्यालय है। यहां पर मोहम्मदन संत शेख शाह बाबल की मजार भी है। रोहतास किले के उत्तर से एक किलोमीटर की दूरी पर बावन तालाब है। यह काफी प्राचीन मंदिरों में से है। पुराने समय में इस गांव के चारों ओर 52 कुंड थे। लेकिन वर्तमान समय में इस प्रकार का कोई तथ्य नहीं मिलता है। यहां पर एक प्राचीन शिव मंदिर भी है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा हरिश्चन्द्र ने करवाया था। इस मंदिर को चौरासन मंदिर के नाम से जाना जाता है। सासाराम सासाराम रोहतास जिले का मुख्यालय है। सासाराम ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। शहर के समीप ही कई स्मारक है। यहीं पर स्थित है शेरशाह का मकबरा जो काफी प्रसिद्ध है। यह मकबरा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मकबरे पर हुई वास्तुकला काफी खूबसूरत है जो काफी संख्या में पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। इसके देखने के लिए देश-विदेश के हजारों पर्यटक आते हैं। इस मकबरे का निर्माण शेर शाह ने सोलहवीं शताब्दी के मध्य में करवाया था। पत्थरों से बना यह मकबरा विशाल कुंड के मध्य स्थित भारत का दूसरा ऊंचा मकबरा है। इस मकबरे को सूखा रोजा के नाम से भी जाना जाता हे। साराराम के समीप पर्वत पर स्थित चांद-तान-पीर पर अशोक अभिलेख मौजूद है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
अकबरपुर
रोहतास के किले से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित कैमूर पर्वत में यह जगह स्थित है। कहा जाता है कि इस जगह का नाम मुगल शासक अकबर के नाम पर रखा गया है। यह जगह रोहतास जिला मुख्यालय के काफी समीप स्थित है। इस जगह पर शासक शाहजहां के समय के मलिक विसहाल खान का मकबरा है। मलिक विसहाल खान रोहतास गढ़ के दारोगा थे।
याकशिनी भगवती
यहां पर देवी दुर्गा का प्रसिद्ध मंदिर है। इन्हें याकशिनी भगवती के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर भगवान शिराक भानखंडी महादेवन का प्राचीन मंदिर भी है। यह मंदिर दिनार खण्ड के पूर्व से सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। काफी संख्या में श्रद्धालु देवी मां से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मंदिर में आते हैं।
शेरगढ़
चैनारी के दक्षिण से 13 किलोमीटर की दूरी पर शेरगढ़ स्थित है। शेर शाह के शासन के दौरान यह सैनिक छावनी था। यहां पर एक किला है जो वर्तमान समय में पूरी तरह से विध्वंस हो चुका है।
कैसे पहुंचे रोहतास
वायु मार्ग
सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। राजधानी पटना से रोहतास 147 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अतिरिक्त गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा द्वारा भी रोहतास पहुंच सकते हैं। गया से रोहतास लगभग 125 किलोमीटर की दूरी पर है।
रेल मार्ग
यहां आप रेलमार्ग से भी आ सकते हैं। रोहतास रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से पहुंचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन सासाराम स्थित है।
सड़क मार्ग
भारत के कई प्रमुख शहरों से रोहतास सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
क्या देखें
रोहतास गढ़
जिला मुख्यालय के पश्चिम से ५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दंतकथाओं के अनुसार, इस जगह का नाम राजा हरिशचन्द्र के पुत्र रोहितासव के नाम पर रखा लिखा गया था। रोहितासव ने यहां पर एक किले का निर्माण करवाया था। यहां के स्थानीय लोगों का मानना है कि रोहतास का अर्थ शुष्क भूमि होता है। रोहतास में एक विशाल किला है। शेरशाह ने रोहतासव के किले को 1538 ई. में कब्जाया था। यह अकबरपुर का जिला मुख्यालय है। यहां पर मोहम्मदन संत शेख शाह बाबल की मजार भी है। रोहतास किले के उत्तर से एक किलोमीटर की दूरी पर बावन तालाब है। यह काफी प्राचीन मंदिरों में से है। पुराने समय में इस गांव के चारों ओर 52 कुंड थे। लेकिन वर्तमान समय में इस प्रकार का कोई तथ्य नहीं मिलता है। यहां पर एक प्राचीन शिव मंदिर भी है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा हरिश्चन्द्र ने करवाया था। इस मंदिर को चौरासन मंदिर के नाम से जाना जाता है। सासाराम सासाराम रोहतास जिले का मुख्यालय है। सासाराम ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। शहर के समीप ही कई स्मारक है। यहीं पर स्थित है शेरशाह का मकबरा जो काफी प्रसिद्ध है। यह मकबरा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मकबरे पर हुई वास्तुकला काफी खूबसूरत है जो काफी संख्या में पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। इसके देखने के लिए देश-विदेश के हजारों पर्यटक आते हैं। इस मकबरे का निर्माण शेर शाह ने सोलहवीं शताब्दी के मध्य में करवाया था। पत्थरों से बना यह मकबरा विशाल कुंड के मध्य स्थित भारत का दूसरा ऊंचा मकबरा है। इस मकबरे को सूखा रोजा के नाम से भी जाना जाता हे। साराराम के समीप पर्वत पर स्थित चांद-तान-पीर पर अशोक अभिलेख मौजूद है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
अकबरपुर
रोहतास के किले से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित कैमूर पर्वत में यह जगह स्थित है। कहा जाता है कि इस जगह का नाम मुगल शासक अकबर के नाम पर रखा गया है। यह जगह रोहतास जिला मुख्यालय के काफी समीप स्थित है। इस जगह पर शासक शाहजहां के समय के मलिक विसहाल खान का मकबरा है। मलिक विसहाल खान रोहतास गढ़ के दारोगा थे।
याकशिनी भगवती
यहां पर देवी दुर्गा का प्रसिद्ध मंदिर है। इन्हें याकशिनी भगवती के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर भगवान शिराक भानखंडी महादेवन का प्राचीन मंदिर भी है। यह मंदिर दिनार खण्ड के पूर्व से सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। काफी संख्या में श्रद्धालु देवी मां से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मंदिर में आते हैं।
शेरगढ़
चैनारी के दक्षिण से 13 किलोमीटर की दूरी पर शेरगढ़ स्थित है। शेर शाह के शासन के दौरान यह सैनिक छावनी था। यहां पर एक किला है जो वर्तमान समय में पूरी तरह से विध्वंस हो चुका है।
कैसे पहुंचे रोहतास
वायु मार्ग
सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। राजधानी पटना से रोहतास 147 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अतिरिक्त गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा द्वारा भी रोहतास पहुंच सकते हैं। गया से रोहतास लगभग 125 किलोमीटर की दूरी पर है।
रेल मार्ग
यहां आप रेलमार्ग से भी आ सकते हैं। रोहतास रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से पहुंचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन सासाराम स्थित है।
सड़क मार्ग
भारत के कई प्रमुख शहरों से रोहतास सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
Friday, 4 January 2013
पर्यटन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण औरंगाबाद
पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण जिला
बिहार के गया जिले से अलग हुए औरंगाबाद किसी समय में मगध साम्राज्य का अभिन्न भाग हुआ करता था। राजधानी पटना से दक्षिण पश्चिम में स्थित यह जिला पर्यटन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रसिद्व ग्रांट ट्रैंक रोड के किनारे बसे इस शहर में पर्यटक मदनपुर की पहाड़ी, बौद्व विहार, देव का प्रसिद्व सूर्य मंदिर, देवकुंड आदि जैसे जगह घूम सकते है।
क्या देखें देव- औंरगाबाद शहर से 10 किमी. दक्षिणपूर्व में स्थित देव का प्रसिद्व सूर्य मंदिर 15वीं शताब्दी का माना जाता है। कहा जाता है कि उमगा के चन्द्रवंशी राजा भैरवेन्द्र सिंह ने इस 100 फीट उंचे मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर के संबंध में यह भी धारणा है कि यहां के बह्म कुंड में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। कार्तिक माह में अगल-बगल के जिले से भी लोग यहां प्रसिद्व छठ पूजा करने आते है।
देवकुंड- यह शहर से दक्षिणपूर्व और जहानाबाद जिले के सीमा पर स्थित है। इस कुंड को ऐतिहासिक स्थल माना जाता है। यह पर एक बहुत प्राचीन भगवान शिव का मंदिर है जिसका उल्लेख पुराण में मिलता है। शिवरात्रि के समय हजारों की संख्या में श्रदालु यहां भगवान शिव पर जल चढ़ाने यहां आते है।
उमगा- यह औरंगाबाद से 24 किमी. पूरब में स्थित है और वैष्णव मंदिर के लिए प्रसिद्व है। इस मंदिर की दीवार ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है। देव तथा यहां के मंदिर को लगभग एक ही तरीके से डिजाइन किया गया है।
अमझार शरीफ- औरंगाबाद से 10 किमी. की दूरी पर स्थित अमझार शरीफ इस्लाम धर्म को मानने वालों का महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। यह दाउदनगर-गया रोड पर स्थित है। यहां पर एक बहुत ही प्राचीन मजार हजरत सैदाना मोहम्मद जिलानी अमझारी कादरी की याद में बना हुआ है। हरेक साल जून के पहले सप्ताह में इनका हिज उर्स मुबारक (वार्षिक समारोह) मनाया जाता है। इस दिन हजारों की संख्या में पूरे भारत वर्ष से इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग जुटते है।
सिरिस- किसी समय में इस जगह पर शेरशाह और मुगल साम्राज्य का आधिपत्य माना जाता था। यहां पर अब एक औरंगजेब का बनवाया हुआ एक मस्जिद है जिस पर पारसी में अभिलेख्ा खुदा हुआ है।
इसके अलावा पर्यटक यहां पर पवई, माली, चंदनगढ़ और पीरु जैसे जगह घूम सकते है।
कब जाएं- अक्टूबर से मार्च तक
कैसे जाएं
वायु मार्ग- यहां का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा गया जिले में स्थित है। पर्यटक राजधानी पटना से भी यहां आ सकते है।
रेल मार्ग- औरंगाबाद शहर में अनुग्रह नारायण स्टेशन है लेकिन गया से सीधी रेल सेवा उपलब्ध है जोकि यहा से 79 किमी. की दूरी पर स्थित है।
सड़क मार्ग- यहां से राजधानी पटना के अलावा बिहार के अनेक जिलों के लिए बस सेवा उपलब्ध है।
पुअर मैन दार्जलिंग पूर्णिया
इस जगह को पुअर मैन दार्जलिंग के नाम से भी जाना जाता है। पूर्णिया पर्यटन की दृष्टि से बिहार राज्य के प्रमुख जिलों में से हैं। पुराणदेवी मंदिर, बारह स्थान, धरहरा, गुलाब बाग और भवानीपुर आदि यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। पूर्णिया जिले से दार्जलिंग पर्वत लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस कारण इस जगह को पुअर मैन दार्जलिंग के नाम से भी जाना जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह स्थान काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस जगह पर मौर्य और गुप्त आदि शासकों ने काफी लम्बे समय तक राज किया। यह जिला अररिया जिले के उत्तर, कटिहार और भागलपुर जिले के दक्षिण, पश्चिम बंगाल के पश्चिम दिनाजपुर और किशजगंज के पूर्व तथा मधेपुरा व सहरसा जिले के पश्चिम से घिरा हुआ है।
कहां जाएं
पुराणदेवी मंदिर
यह मंदिर त्रिपुरा सुंदरी का प्राचीन मंदिर है। त्रिपुरा सुंदरी देवी दुर्गा का ही एक रूप है। पूर्णिया शहर स्थित इस मंदिर के प्रति यहां लोगों में काफी श्रद्धा है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा चंद्रा लाल सिंह ने करवाया था।
बनीली
यह गांव पूर्णिया के उत्तर से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कस्बा के उत्तर-पश्चिम में है। इस गांव में एक प्राचीन मंदिर और किला है।
बारह स्थान
यह मंदिर भवानीपुर के समीप स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 1948 ई. में किया गया था। मंदिर में भगवान ब्रह्मा की पत्थर की बनी मूर्ति स्थापित है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है।
भवानीपुर
पूर्णिया शहर के दक्षिण.पश्चिम से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर कृत्यानन्द नगर के समीप यह गांव स्थित है। यह गांव यहां स्थित देवी कामाख्या के मंदिर के लिए जाना जाता है। माना जाता है कि इस मंदिर में सच्चे दिल से प्रार्थना करने पर सारे रोगों से मुक्ति मिल जाती है। इसी कारण यहां भक्तों की भीड़ रहती है। प्रत्येक वर्ष चैत्र माह में यहां वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है।
धरहरा
धामदहा के उत्तर-पूर्व से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर धरहरा गांव स्थित है। यह बनमानखी बाजार से बस कुछ ही दूरी पर है। यह बाजार विशेषत: अपनी प्राचीन परम्परा के लिए जाना जाता है। इस गांव में एक प्राचीन किला है। जिसे साकेतगढ़ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार इस किले का निर्माण राक्षस, राजा हिरण्यकश्यप ने करवाया था। यहां पर एक एकाश्मक भी है जिसे माणिकथन के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि माणिकथन स्तम्भ में से भगवान नरसिंह प्रकट हुए थे और उन्होंने हिरण्यकश्यप का वध किया था।
गुलाब बाग
पूर्णिया रेलवे स्टेशन के समीप स्थित यह प्रमुख जूट बाजार है। प्रत्यके वर्ष काफी संख्या में यहां भिन्न.भिन्न मेलों का आयोजन किया जाता है।
मजरा
यह गांव कृत्यानन्द नगर खण्ड में स्थित है। यहां पर एक सर्वोदय आश्रम और भगवान शिव का मंदिर है। प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि के अवसर पर शिव मंदिर में बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। काफी संख्या में लोग मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने के लिए आते हैं।
कहां ठहरें
पूर्णिया में ठहरने के लिए ज्यादा विकल्प नहीं है। इसलिए यहां आने वाले पर्यटक आमतौर पर इसके नजदीकी शहर पटना में ठहरते हैं। पटना के प्रमुख होटलों की सूची इस प्रकार है।
कैसे पहुंचे
वायु मार्ग
यहां का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट है। पटना से पूर्णिया 313 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा, गया अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट, गया भी है। गया से पूर्णिया 319 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग
सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन कटिहार है। यह स्थान रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।
सड़क मार्ग
राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 31 से पूर्णिया पहुंचा जा सकता है। भारत के कई प्रमुख शहरों जैसे उत्तर प्रदेश, बंगाल, आसाम, उड़ीसा और झारखंड आदि से पूर्णिया सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
कहां जाएं
पुराणदेवी मंदिर
यह मंदिर त्रिपुरा सुंदरी का प्राचीन मंदिर है। त्रिपुरा सुंदरी देवी दुर्गा का ही एक रूप है। पूर्णिया शहर स्थित इस मंदिर के प्रति यहां लोगों में काफी श्रद्धा है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा चंद्रा लाल सिंह ने करवाया था।
बनीली
यह गांव पूर्णिया के उत्तर से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कस्बा के उत्तर-पश्चिम में है। इस गांव में एक प्राचीन मंदिर और किला है।
बारह स्थान
यह मंदिर भवानीपुर के समीप स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 1948 ई. में किया गया था। मंदिर में भगवान ब्रह्मा की पत्थर की बनी मूर्ति स्थापित है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है।
भवानीपुर
पूर्णिया शहर के दक्षिण.पश्चिम से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर कृत्यानन्द नगर के समीप यह गांव स्थित है। यह गांव यहां स्थित देवी कामाख्या के मंदिर के लिए जाना जाता है। माना जाता है कि इस मंदिर में सच्चे दिल से प्रार्थना करने पर सारे रोगों से मुक्ति मिल जाती है। इसी कारण यहां भक्तों की भीड़ रहती है। प्रत्येक वर्ष चैत्र माह में यहां वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है।
धरहरा
धामदहा के उत्तर-पूर्व से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर धरहरा गांव स्थित है। यह बनमानखी बाजार से बस कुछ ही दूरी पर है। यह बाजार विशेषत: अपनी प्राचीन परम्परा के लिए जाना जाता है। इस गांव में एक प्राचीन किला है। जिसे साकेतगढ़ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार इस किले का निर्माण राक्षस, राजा हिरण्यकश्यप ने करवाया था। यहां पर एक एकाश्मक भी है जिसे माणिकथन के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि माणिकथन स्तम्भ में से भगवान नरसिंह प्रकट हुए थे और उन्होंने हिरण्यकश्यप का वध किया था।
गुलाब बाग
पूर्णिया रेलवे स्टेशन के समीप स्थित यह प्रमुख जूट बाजार है। प्रत्यके वर्ष काफी संख्या में यहां भिन्न.भिन्न मेलों का आयोजन किया जाता है।
मजरा
यह गांव कृत्यानन्द नगर खण्ड में स्थित है। यहां पर एक सर्वोदय आश्रम और भगवान शिव का मंदिर है। प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि के अवसर पर शिव मंदिर में बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। काफी संख्या में लोग मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने के लिए आते हैं।
कहां ठहरें
पूर्णिया में ठहरने के लिए ज्यादा विकल्प नहीं है। इसलिए यहां आने वाले पर्यटक आमतौर पर इसके नजदीकी शहर पटना में ठहरते हैं। पटना के प्रमुख होटलों की सूची इस प्रकार है।
कैसे पहुंचे
वायु मार्ग
यहां का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट है। पटना से पूर्णिया 313 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा, गया अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट, गया भी है। गया से पूर्णिया 319 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग
सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन कटिहार है। यह स्थान रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।
सड़क मार्ग
राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 31 से पूर्णिया पहुंचा जा सकता है। भारत के कई प्रमुख शहरों जैसे उत्तर प्रदेश, बंगाल, आसाम, उड़ीसा और झारखंड आदि से पूर्णिया सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
Thursday, 3 January 2013
धार्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध मधेपुरा
धार्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध मधेपुरा बिहार राज्य का एक जिला है। चंडी स्थान, सिंघेश्वर स्थान, श्रीनगर, रामनगर, बसन्तपुर, बिराटपुर और बाबा करु खिरहर आदि यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से हैं। मधेपुरा का इतिहास कुषाण वंश के शासनकाल से सम्बन्धित है। प्राचीन समय में भांत समुदाय के लोग शंकरपुर खंड स्थित बसंतपुर और रायभीर गांव में रहते थे। मधेपुरा मौर्य वंश का ही एक हिस्सा था। इस बात का प्रमाण उद-किशनगंज स्थित मौर्य स्तम्भ में मिलता है। अकबर के समय की मस्जिद वर्तमान समय में सारसंदी गांव में स्थित है, जो कि इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है। इसके अतिरिक्त, सिंकदर शाह भी इस जिले में घूमने के लिए आए थे। इसका जिला मुख्यालय मधेपुरा शहर है। यह जिला अररिया और सुपौल जिले के उत्तर, खगरिया और भागलपुर जिले के दक्षिण, पूर्णिया जिले के पूर्व तथा सहरसा जिले के पश्चिम से घिरा हुआ है
कहा जाता है कि पौराणिक काल में कोशी नदी के तट पर ऋषि श्रृंग का आश्रम था। ऋषि श्रृंग भगवान शिव के भक्त थे और वह आश्रम में भगवान शिव की प्रतिदिन उपासना किया करता था। श्रृंग ऋषि के आश्रम स्थल को श्रृंगेश्वर के नाम से जाना जाता था। कुछ समय बाद इस उस जगह का नाम बदलकर सिंहेश्वर हो गया। महाजनपद काल में मधेपुरा अंग एवं मौर्य वंश का हिस्सा था। इसका प्रमाण उदा-किशनगंज स्थित मौर्य स्तम्भ से मिलता है। बाद के वर्षों में मधेपुरा का इतिहास कुषाण वंश के शासनकाल से सम्बन्धित है। शंकरपुर प्रखंड के बसंतपुर तथा रायभीर गांवों में रहने वाले भांट समुदाय के लोग कुशान वंश के परवर्ती हैं। मुगल शासक अकबर के समय की मस्जिद वर्तमान समय में सारसंदी गांव में स्थित है, जो कि इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, सिंकंदर शाह भी इस जिले में घूमने के लिए आए थे।
प्रसिद्ध स्थल
सिंहेश्वर स्थान
यह मधेपुरा से आठ किलोमीटर उत्तर में समपूर्ण कोसी अंचल का महान शैव तीर्थ है। यहाँ का शिवलिंग अत्यंत प्रचीन है। वराहपुराण के उत्तर्राद्ध की एक कथा के अनुसार विष्णु ने इस शिवलिंग की स्थापना की थी। सिंहेश्वर के निकट ही कोसी तट पर सतोखर गांव है, जहाँ श्रृंग ऋषि ने 'द्वादश वर्षीय यज्ञÓ किया था जिसमें गुरुपत्नी अरुनधती के साथ राम की तीन माताएं आई थीं। इस यज्ञ का उल्लेख भवभूति ने 'उत्तर रामचरितÓ के प्रथमांक में किया है। इस यज्ञ के सारे साक्ष्य कोसी तीर पर सात कुंडों के रूप में मौजूद हैं । दो कुण्ड कोसी के पेट में समा गये हैं। खुदाई में राख के मोटी परत प्राप्त हुई है जो दीर्धकाल तक होने वाले यज्ञ के साक्ष्य हैं। सिंधेश्वर स्थान में तीन आर्योत्तर जातियाँ कुशाण, किरात और निषादों की संस्कृति का पुरा काल में ही विकास हुआ और यह शैव तीर्थ आदि काल से ही उन्हीं के द्वारा पुजित, संरक्षित एवं संरक्षित होता रहा।
श्रीनगर
मधेपुरा शहर से लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में स्थित श्रीनगर एक गांव है। इस गांव में दो किले हैं। माना जाता है कि इनसे से एक किले का इस्तेमाल राजा श्री देव रहने के लिए किया करते थे। किले के पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर दो विशाल कुंड स्थित है। जिसमें पहले कुंड को हरसैइर और दूसर कुंड को घोपा पोखर के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त यहां एक मंदिर भी है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर में स्थित पत्थरों से बने स्तंभ इसकी खूबसूरती को और अधिक बढ़ाते हैं।
रामनगर
मुरलीगंज रेलवे स्टेशन से लगभग 16 किलोमीटर की दूरी पर रामनगर गांव है। यह गांव विशेष रूप से यहां स्थित देवी काली के मंदिर के लिए जाना जाता है। प्रत्येक वर्ष काली-पूजा के अवसर पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है।
बसन्तपुर
मधेपुरा के दक्षिण से लगभग 24 किलोमीटर की दूरी पर बसंतपुर गांव स्थित है। यहां पर एक किला है जो कि पूरी तरह से विध्वंस हो चुका है। माना जाता है कि यह किला राजा विराट के रहने का स्थान था। राजा विराट के साले कीचक, द्रौपदी से यह किला छिन लेना चाहते थे। इसी कारण भीम ने इसी गांव में उसको मारा था।
बिराटपुर
यह गांव देवी चंडिका के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि इस मंदिर का सम्बन्ध महाभारत काल से है। कहा जाता है कि इस मंदिर का प्रमुख द्वार विराट के महल की ओर है। 11वीं शताब्दी में राजा कुमुन्दानंद के सुझाव से इस मंदिर के बाहर पत्थर के स्तम्भ बनवाए गए थे। इन स्तम्भों पर अभिलेख देखे जा सकते हैं। सोनबरसा रेलवे स्टेशन से लगभग नौ किलोमीटर की दूरी पर बिराटपुर गांव है। इस बात में कोई शक नहीं है कि यह मंदिर काफी प्राचीन है। इसके साथ ही यहां पर दो स्तूप भी है। लगभग 300 वर्ष प्राचीन इस मंदिर में काफी संख्या में भक्तों की भीड़ रहती है। मंदिर के पश्चिम से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा पर्वत है। लोगों का मानना है कि कुंती और उनके पांचों पुत्र पांडव इस जगह पर रहे थे।
बाबा करु खिरहर बाबा करु खिरहर मंदिर का नाम एक प्रसिद्ध संत के नाम पर रखा गया था। बाबा करु खिरहर मंदिर महर्षि खण्ड के महपुरा गांव में स्थित है। आसाम,बंगाल, उत्तर प्रदेश एवं बिहार के आस-पास के जिलों से काफी संख्या में लोग यहां आते हैं।
कन्दहा का सूर्य मन्दिर
यह इस क्षेत्र का एकमात्र सूर्य मन्दिर है। यहाँ धेमुरा (धर्ममूला) नदी एक बड़े चैड़़े से आकार कन्दाहा और देवनगोपाल गाँव के मध्य होकर बहती है। कहा जाता है कि यहाँ भगवान शिव ने विवेक, बुद्धि तथा अदम्य संकल्प शक्ति का प्रतीक अपने तृतीय नयन से कामदेव का दहन किया था जिसमें सूर्य का तेज था। कन्दाहा में द्वादशादित्यों में प्रसिद्ध 'भवादित्यÓ का प्राचीन सूर्य मन्दिर है। यह कन्दर्प दहन का साक्षी भी है तथा अंग देश के निर्माण का श्रेय भी इसी स्थल को है। कन्दाहा के चारों ओर अनेक शिव मंदिर हैं जिसमें देवनवन महादेव अति विख्यात हैं। इस शिवलिंग को महाभारत के पश्चात वाणासुर ने स्थापित किया था। इसके अतिरिक्त चैनपुर में नीलकंठ महादेव, बनगाँव में भव्य शिव मंदिर महिषी के निकट नकुचेश्वर महादेव तथा मुख्य कोसी के पश्चिम कुश ऋषि द्वारा स्थापित कुशेश्वरनाथ का भव्य मंदिर महतवपूर्ण है ।
आवागमन
वायु मार्ग
यहां का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। पटना से मधेपुरा 234 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग
मधेपुरा रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन दौराम मधेपुरा है।
सड़क मार्ग
भारत के कई प्रमुख शहरों शहरों से मधेपुरा सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा सकते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर-31 से होते हुए मधेपुरा पहुंचा जा सकता है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जन्मभूमि-कर्मस्थली सिवान
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद तथा कई अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों की जन्मभूमि एवं कर्मस्थली के लिए सिवान को जाना जाता है। बिहार प्रान्त में सारन प्रमंडल के अंतर्गत सिवान है। यह बिहार के उत्तर पश्चिमी छोड़ पर उत्तर प्रदेश का सीमावर्ती जिला है। जिला मुख्यालय सिवान शहर दाहा नदी के किनारे बसा है। इसके उत्तर तथा पूर्व में क्रमश: बिहार का गोपालगंज तथा सारण जिला तथा दक्षिण एवं पश्चिम में क्रमश: उत्तर प्रदेश का देवरिया और बलिया जिला है। कुछ दिनों पहले तक सिवान जिला कुख्यात सैयद शहाबुद्दीन के जिले के नाम से जाना जाता था। लेकिन आज यहां का माहौल काफी शांतिपूर्ण है। यहां आकर आप अपने को गौरन्वावित महसूस करेंगे।
सिवान पांचवी सदी ईसापूर्व में सिवान की भूमि कोसल महाजनपद का अंग था। कोसल राज्य के उत्तर में नेपालए दक्षिण में सर्पिका (साईं) नदी, पुरब में गंडक नदी तथा पश्चिम में पांचाल प्रदेश था। इसके अंतर्गत आज के उत्तर प्रदेश का फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, गोरखपुर तथा देवरिया जिला के अतिरिक्त बिहार का सारन क्षेत्र (सारन, सिवान एवं गोपालगंज) आता है। आठवीं सदी में यहाँ बनारस के शासकों का आधिपत्य था। 15 वीं सदी में सिकन्दर लोदी ने यहाँ अपना आधिपत्य स्थापित किया। बाबर ने अपने बिहार अभियान के समय सिसवां के नजदीक घाघरा नदी पार की थी। बाद में यह मुगल शासन का हिस्सा हो गया। अकबर के शासनकाल पर लिखे गए आईना-ए-अकबरी के विवरण अनुसार कर संग्रह के लिए बनाए गए 6 सरकारों में सारन वित्तीय क्षेत्र एक था और इसके अंतर्गत वर्तमान बिहार के हिस्से आते थे। 17वीं सदी में व्यापार के उद्देश्य से यहाँ डच आए लेकिन बक्सर युद्ध में विजय के बाद सन 1765 में अंग्रेजों को यहाँ का दिवानी अधिकार मिल गया। 1829 में जब पटना को प्रमंडल बनाया गया तब सारन और चंपारण को एक जिला बनाकर साथ रखा गया। 1908 में तिरहुत प्रमंडल बनने पर सारन को इसके साथ कर इसके अंतर्गत गोपालगंजए सिवान तथा सारन अनुमंडल बनाए गए। 1857 की क्रांति से लेकर आजादी मिलने तक सिवान के निर्भीक और जुझारु लोगों ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ अपनी लड़ाई लड़ी। 1920 में असहयोग आन्दोलन के समय सिवान के ब्रज किशोर प्रसाद ने पर्दा प्रथा के विरोध में आन्दोलन चलाया था। 1937 से 1938 के बीच हिन्दी के मूर्धन्य विद्वान राहुल सांकृत्यायन ने किसान आन्दोलन की नींव सिवान में रखी थी। स्वतंत्रता की लड़ाई में यहाँ के मजहरुल हक़, राजेन्द्र प्रसाद, महेन्द्र प्रसाद, फूलेना प्रसाद जैसे महान सेनानियों ने समूचे देश में बिहार का नाम ऊँचा किया है। स्वतंत्रता पश्चात 1981 में सारन को प्रमंडल का दर्जा मिला। जून 1970 में बिहार में त्रिवेदी एवार्ड लागू होने पर सिवान के क्षेत्रों में परिवर्तन किए गए। सन 1885 में घाघरा नदी के बहाव स्थिति के अनुसार लगभग 13000 एकड़ भूमि उत्तर प्रदेश को स्थानान्तरित कर दिया गया जबकि 6600 एकड़ जमीन सिवान को मिला।
पर्यटन स्थलदोन स्तूप (दरौली) दरौली प्रखंड के दोन गाँव में यह एक महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल है। दरौली नाम मुगल शासक शाहजहाँ के बेटे दारा शिकोह के नाम पर पड़ा है। ऐसी मान्यता है कि दोन में भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार यहाँ हुआ था। हिंदू लोग यह मानते हैं कि यहाँ किले का अवशेष महाभारत काल का है जिसे गुरु द्रोणाचार्य ने बनवाया था। उपलब्ध साक्ष्यों को देखने से इस मान्यता को बल नहीं मिलता। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वर्णन में इस स्थान पर एक पुराना स्तूप होने का जिक्र किया है। स्तूप के अवशेष स्थल पर तारा मंदिर बना है जिसमें नवीं सदी में बनी एक मूर्ति स्थापित है।
अमरपुर
दरौली से 3 किलोमीटर पश्चिम में घाघरा नदी के तट पर स्थित इस गाँव में मुगल शाहजहाँ के शासनकाल (1626-1658) में यहाँ के नायब अमरसिंह द्वारा एक मस्जिद का निर्माण शुरु कराया गया जो अधूरा रहा। लाल पत्थरों से बनी अधूरी मस्जिद को यहाँ देखा जा सकता है।
मैरवा धाम
सिवान के मैरवा प्रखंड में हरि बाबा का स्थान के नाम से प्रचलित झरही नदी के किनारे इस स्थान पर कार्तिक और चैत्र महीने में मेला लगता है। यह ब्रह्म स्थान एक संत की समाधि पर स्थित है। इस स्थान पर डाक बंग्ला के सामने बने चनानरी डीह (ऊँची भूमि) पर एक अहिरनी औरत के आश्रम को पूजा जाता है।
मेंहदार
सिसवां प्रखंड में स्थित इस गाँव के बावन बीघे में बने पोखर के किनारे शिव एवं विश्वकर्मा भगवान का मंदिर बना है। स्थानीय लोगों में इस पोखर को पवित्र माना जाता है। यहाँ शिवरात्रि एवं विश्वकर्मा पूजा (17 सितंबर) को भाड़ी भीड़ जुटती है।
लकड़ी दरगाह
मुस्लिम संत शाह अर्जन के दरगाह पर रब्बी-उस-सानी के 11 वें दिन होनेवाले उर्स पर भाड़ी मेला लगता है। इस दरगाह पर लकड़ी का बहुत अच्छी कासीगरी की गयी है। कहा जाता है कि इस स्थान की शांति के चलते शाह अर्जन बस गए थे और उन्होंने 40 दिनों तक यहाँ चिल्ला किया था।
हसनपुरा
हुसैनीगंज प्रखंड के इस गाँव में अरब से आए चिश्ती सिलसिले के एक मुस्लिम संत मख्दूम सैय्यद हसन चिश्ती आकर बस गए थे। यहाँ उन्होंने खानकाह भी स्थापित किया था।
भिखाबांध
महाराजगंज प्रखंड में इस जगह पर एक विशाल पेड़ के नीचे भैया-बहिनी का मंदिर बना है। कहा जाता है कि 14 वीं सदी में मुगल सेना से लड़ाई में दोनों भाई बहन मारे गए थे।
जिरादेई
सिवान शहर से 13 किमी पश्चिम में देशरत्न डा राजेन्द्र प्रसाद का जन्म स्थान को देखकर आपक गौरन्वावित महसूस करेंगे। डा. राजेंद्र प्रसाद का जन्म बिहार के तत्कालीन सारण और आज के सिवान जिले के जिरादेई में तीन दिसंबर 1884 को हुआ। इनके पिता का नाम महादेव सहाय तथा माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। इनके पिता जी पर्सियन थे और संस्कृत भाषा के विद्वान भी थे।
फरीदपुर
बिहार रत्न मौलाना मजहरूल हक़ का जन्म स्थान है।
सोहगरा
शिव भगवान का मंदिर है। जहा जाने के लिए गुठनी चौराहा से तेनुआ मोड़, और गाँव नैनिजोर होते हुए सोहगरा मंदिर जाया जाता है। यहाँ शिवरात्रि और सावन मे भाड़ी भीड़ जुटती है।
हड़सरयह दुरौधा स्टेशन से दो किलोमीटर अन्दर है। यहां काली मां का मंदीर है जो देवी थावे मंदिर में है। थावे जाते समय इनका यही अंतिम पडाव था। यहां कोई मंदिर नही है अब आस्था गहरी है।
पातार
इस गांव के प्र्रसिद्ध राम जी बाबा का मन्दिर है। यहां के लोगों की मान्यता है कि किसी भी आदमी को सर्प काटता है तो यहाँ पर आने से सही हो जाता है। इसी गांव में श्री विश्वनाथ पाण्डेय जी के सुपुत्र प्रसिद्ध ज्योतिष आचार्य मुरारी पाण्डेय जी का जन्मस्थली हे।
नरहन
जिला मुख्यालय से 30 किमी0 दक्षिण में अवस्थित है। यह एक हिन्दुओ क प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। कार्तिक पुर्निमा एवम मकर सक्रान्ति के दिन यहां मेले का आयोजन होता है जिसमे काफी मात्र्रा मे श्रद्धालु आते है और सरयु नदी के पवित्र जल मे स्नान करते है । यहा आश्विन पुर्निमा के दिन दुर्गा पुजा के बाद एक भब्य जुलुश का आयोजन होता है जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते है। कुछ प्रसिद्ध स्थलो में श्री नाथ जी का महाराज मंदिर, मां भगवती मंदिर, राम जानकी मंदिर, मां काली मंदिर एवं ठाकुर जी मंदिर है जो इस गांव को चारो ओर से घेरे हुए है।
Subscribe to:
Posts (Atom)






