Tuesday, 1 January 2013

हिंदू और बौद्ध देवी देवताओं के लिए प्रसिद्ध लखीसराय

 लखीसराय बिहार के महत्वपूर्ण शहरों में एक है। इस जिले का गठन 3 जुलाई 1994 को किया गया था। इससे पहले यह मुंगेर जिला के अंतर्गत आता था। इतिहासकार इस शहर के अस्तित्व के संबंध में कहते हैं कि यह पाल वंश के समय अस्तित्व में आया था। यह दलील मुख्य रूप से यहां के धार्मिक स्थलों को साक्ष्य मानकर दिया जाता है। चूंकि उस समय के हिंदू राजा मंदिर बनवाने के शौकीन हुआ करते थे, अत: उन्होंने इस क्षेत्र में अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया था। इन मंदिरों में कुछ महत्वपूर्ण तीर्थस्थान इस प्रकार हैं। अशोकधाम, भगवती स्थान, बड़ैहया, श्रृंगऋषि, जलप्पा स्थान, अभयनाथ स्थान, अभयपुर, गोबिंद बाबा स्थान, मानो-रामपुर, दुर्गा स्थान, लखीसराय आदि। इसके अलावा महारानी स्थान, दुर्गा मंदिर देखने लायक हैं।
लखीसराय की स्थापना पाल वंश के दौरान एक धार्मिक-प्रशासनिक केंद्र के रूप में की गई थी। यह क्षेत्र हिंदू और बौद्ध देवी देवताओं के लिए प्रसिद्ध है। बौद्ध साहित्य में इस स्थान को अंगुत्री के नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ है जिला। प्राचीन काल में यह अंग प्रदेश का सीमांत क्षेत्र था। पाल वंश के समय में यह स्थान कुछ समय के लिए राजधानी भी रह चुका है। इस स्थान पर धर्मपाल से संबंधित साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं। जिले के बालगुदर क्षेत्र में मदन पाल का स्मारक  भी पाया गया है। ह्वेनसांग ने इस जगह पर 10 बौद्ध मठ होने के संबंध में विस्तार से बताया है। उनके अनुसार यहां मुख्य रूप से हीनयान संप्रदाय के बौद्ध मतावलंबी आते थे। इतिहास के अनुसार 11वीं सदी में मोहम्मद बिन बख्तियार ने यहां आक्रमण किया था। शेरशाह ने 15वीं सदी में यहां शासन किया था जबकि यहां स्थित सूर्यगढ़ा शेरशाह और मुगल सम्राट हुमायूं के युद्ध का साक्षी है।

पर्यटन स्थल
अशोकधाम

हिंदू तीर्थयात्रियों के पवित्र स्थानों में से एक है अशोकधाम। यहां पाया गया शिवलिंग काफी बड़ा है। यहां खासकर महाशिवरात्रि और सावन के महीने में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है। इस स्थान पर कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान भी होते रहते हैं। इनमें से मुंडन बहुत लोकप्रिय है। यहां जाने के लिए लखीसराय रेलवे स्टेशन से मोटर वाहन या तांगा से जाया जा सकता है। अशोक धाम एक परच्हैं मन्दिर इस बहुत पुरानि काहानि है लखिसराय मे एक चारबाहा जिस्क नाम अशोक था वो नित दिन गाय चाराने गाया करता था कि वो देख कि एक बहुत बरि शिवे लिङ धरति के अन्दर परा है तो वो उस शिवलिग को कबर्न लगा पर वो तस से मस नहि हुआ तो वो वोहि एक मन्दिर क निर्मान कर दिय तब से वो मन्दिर का नाम अशोक धाम र्प गया
जलप्पा स्थान
यह स्थान आसपास के क्षेत्रों के अलावा दूर-दराज के इलाकों में भी काफी प्रसिद्ध है। यह धार्मिक स्थान पहाडिय़ों पर स्थित है। जलप्पा स्थान मुख्य रूप से गौ पुजा के लिए जाना जाता है। यहां खासकर हर मंगलवार को श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। यहां जाने के लिए लखीसराय से चानन क्षेत्र होते हुए जीप, टैक्सी अथवा तांगे से जया जा सकता है। पैदल तीर्थयात्री मानो गांव होते हुए लगभग दो घंटे पैदल चलने के बाद जलप्पा स्थान पहुंचा जा सकता है। साल के प्रारंभ में यहां भारी संख्या में सैलानी आते हैं।
गोबिंद बाबा स्थान
गोबिंद बाबा का स्थान इस पूरे क्षेत्र में पूजनीय है। यह मंदिर मानो-रामपुर गांव में स्थित है। धार्मिक रूप से इस स्थान का काफी महत्व है। इस मंदिर की मुख्य विशेषता यहां का पूजा है जिसको ढ़ाक के नाम से जाना जाता है।
श्रृंग ऋषि
खडग़पुर की पहाडिय़ों पर स्थित यह तीर्थस्थल लखीसराय का श्रृंगार है। यह स्थान जिले के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। इसका नाम प्रसिद्ध ऋषि श्रृंग के नाम पर रखा गया है। यहां शिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जुटती है। यहां आनेवाले पर्यटकों के लिए झरना आकर्षण के केंद्र बिदू में रहता है।
पोखरामा
यह एक दर्शनीय स्थान है, यहाँ बहुत सारे मंदिर और तालाब है। दु:खभंजन स्थान, काली स्थान, ठाकुरबाड़ी, क्षेमतरणी, सूर्यमंदिर और साधबाबा इस पूर क्षेत्र में पूजनीय है। यहां छठ के अवसर पर श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जुटती है।
सूर्यगढ़ा
लखीसराय जिलान्तर्गत, सूर्यगढ़ा प्रखंड के उरैन में पहाड़ पर उकेरी गई महात्मा बुद्ध के रेखाचित्रों के साथ इसी उरैन में  मृदभाड़ प्राप्त हुआ है, इसके संबंध में बताया जाता है कि यह 7वीं से 8वीं शताब्दी का है, जिसकी ऊॅचाई 41/2 फीट, परिधि 10 फीट तथा गला 5 फीट है । उरैन के संबंध में अनेकानेक इतिहासकार, विद्वान, पुरातत्ववेता ने अपने शोध एवं यात्रा वृतांत में अंकित किया है, जिनमें मुख्य रूप से विश्व प्रसिद्ध यात्री ह्ननेसांग एवं वैडेल जैसे महान विद्वान उल्लेखनीय हैं। वर्ष 1950 में इतिहासकार प्रो0 श्री डी0सी0 सरकार ने स्वयं उरैन, आकर इसकी चर्चा किया था, किन्तु यह मृदभाड़ विलुप्त हो गया था। इसकी विलुप्तता के संबंध में प्रो0 राम रघुवीर, डी0 जे0 कॉलेज, मुंगेर ने भी अपनी पुस्तक 'मुंगेर का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक भूगोलÓ में भी उल्लेख किया है। उल्लेखनीय है कि उरैन सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक एक प्रमुख बौध तीर्थ स्थल था। बताया जाता है कि इस स्थल का कभी उत्खनन नहीं किया गया है।
आवागमन
हवाई मार्ग

हालांकि यह शहर हवाई मार्ग से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा हुआ है लेकिन राजधानी पटना तक हवाई मार्ग की सुविधा है। जहां से रेल या सड़क मार्ग से लखीसराय पहुंचा जा सकता है। पटना लखीसराय से 142 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग
लखीसराय स्टेशन दिल्ली-हावड़ा मुख्य लाईन पर है। इसलिए यह शहर दिल्ली से सीधे जुड़ा हुआ है। किउल जंक्शन पास में होने के कारण यह स्थान बिहार के अन्य क्षेत्रों से भी प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ा हुआ है।
सड़क मार्ग
यह जिला राष्ट्रीय राजमार्ग 80 पर स्थित है जो राजधानी पटना से जुड़ा हुआ है। यहां आने के लिए निजी या सार्वजनिक वाहनों का उपयोग किया जा सकता है।

Monday, 31 December 2012

मगध एवं अंग संस्कृति का संधिस्थल शेखपुरा

शेखपुरा मगध एवं अंग संस्कृति का संधिस्थल है। इस पवित्र धरती का संबंध महाभारत काल, पालवंश तथा मुस्लिम शासकों से जुड़ा है। लोकगाथाओं में वर्णित है। गिरीहिंडा पहाड़ पर हुंडा नामक दानवी से महापराक्रमी भीम ने गंधर्व विवाह किया। उनके पुत्र हुंडारक हुए। कहा जाता है कि गौतम बुद्ध ने शेखपुरा के श्यामा पोखर पर रात्रि विश्राम किया था तथा मटोखर दहपर शिष्यों को उपदेश दिया था। पाल वंश के शासनकाल में शेखपुरा मुख्य प्रशासनिक केन्द्र था। मटोखर दह तथा पचना गांव में सरोवर तथा पचना पहाड़ पर खंडहर व पवनचक्की के अंश अभी भी विद्यमान है। मुस्लिम शासनकाल में शेखपुरा को कोतवाली का दर्जा मिला। बुजुर्गो के मुताबिक फरीद खान युवा काल में शिकार करते-करते शेखपुरा से 8 किलोमीटर पश्चिम उत्तर एक गांव में पहुंचे। रात्रि विश्राम किया। फरीदपुर आज भी है। यहीं शेर का शिकार करने के बाद उनका नाम शेरशाह पड़ा। धारणा है कि उन्होंने ही शहर के खांडपर पहाड़ को कटवाकर मार्ग बनवाया तथा पहाड़ से दक्षिण कुआं खुदवाया थाए जो आज दाल कुआं कहलाता है। इलाके का इतिहास अली इब्राहिम खान से लेकर अंतिम नवाब बाकर अली खान से जुड़ा है। कहते हैं। नवाब अली खान ने ठंड से परेशान सियारों में भी कम्बल बांटने का निर्देश दिया था। ब्रिटिश काल में शेखपुरा ने खान अब्दुल गफ्फार खान, डा.राजेन्द्र प्रसाद, स्वामी सहजानंद सरस्वती, रामधारी सिंह दिनकर, विनोबा भावे, डा. श्रीकृष्ण सिंह जैसे मनीषियों को अपनी ओर आकर्षित किया।
गिरिहिंडा पहाड़
 शेखपुरा को प्रकृति का अमूल्य वरदान हैं। इस पहाड़ की ऊंचाई लगभग 500 फीट है, जिसकी चोटी पर एक शिव मंदिर है। इसकी चोटी से नीचे देखने पर टेढी-मेढी नदियों के उजले रेत, बागीचों एवं उपवनों की झुरमुटे तथा लह-लहाते खेत अत्यंत ही मनोहर प्राकृतिक दृश्य उपस्थित करता है। जिला प्रशासन द्वारा इसे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने हेतु इसके चोटी पर बाल उद्धान, कैंन्टीन, फव्वारा, हाई मास्ट लाईट तथा इसकी चोटी पर मोटरवाहन द्वारा पहुंचने हेतु 2200 फीट लम्बे पक्के सड़क का निर्माण कराया गया है।
पर्यटक स्थलों में शुमार होने की बाट जोह रहा मटोखर दह
प्रकृति की मनोरम गोद में अवस्थित शेखपुरा जिला का मटोखर दह (तालाब) एक पर्यटक स्थल होने की सारी अहर्ता रखने के बावजूद इस श्रेणी में शुमार होने की बाट जोह रहा है। टाटी नदी का किनारा और पहाड़ी इस क्षेत्र के अनुपम रूप में चार चांद लगा रही है। वैसे तो शेखपुरा के ईद-गिर्द अनेक मनमोहक स्थल है लेकिन पवित्रता एवं रमणीयता के कारण मटोखर दह एक अलग स्थान रखता है। इन दिनों मत्स्य विभाग इस तालाब को मछली उत्पादन के लिए कई खंडों में विभक्त कर रहा है, जो इस तालाब की विशालता व सौन्दर्य को कम कर रहा है।
मटोखर दह तालाब शेखपुरा जिला मुख्यालय से लगभग 7 किलोमीटर पश्चिम एवं शेखोपुरसराय प्रखंड से लगभग 9 किलोमीटर दूरी पर अवस्थित है। यहां जाने के लिए शेखपुरा से जीप, टमटम, रिक्शा आदि साधन मुहैया हैं। यह तालाब मटोखर नामक गांव के समीप है। इसलिए इसे मटोखर दह कहते है। इस दह के दक्षिण देवरा एवं पथरैटा तथा पश्चिम में लोदीपुर व ढेवसा सरीखे प्राचीन गांव बसे है। मटोखर दह का क्षेत्रफल एक किलोमीटर लम्बा एवं आधा किलोमीटर चौड़ा है। कालांतर में इसकी गहराई में कमी आयी है। पहले इसकी गहराई को लेकर तरह.तरह के कयास लगाये जाते थे। लोग एक छोर से दूसरे छोर तक जाने की शर्त लगाते थे, तैराकी की प्रतियोगिताएं होती थीं। इस तालाब को आर-पार करना कठिन माना जाता था। इस दह (तालाब) में कभी भी पानी नहीं सूखता था। सर्दी एवं गर्मी में अनेक प्रकार के प्रवासी पक्षी जल विहार करने आते थे। इस दह में कमल एवं कमलिनी का जाल बिछा थाए जो इसकी शोभा बढ़ाते थे। कमल के पत्तों का इस्तेमाल आसपास के गांवों में होने वाले भोज में पत्तल के रूप में किया जाता था। मटोखर गांव के लोगों एवं वहां के किसानों के लिए यह तालाब जीविका का साधन भी है। कृषि कार्य के लिए पूरे क्षेत्र में यह सिंचाई का एक मात्र साधन है। इस दह की रेहू मछली प्रसिद्ध है। इसलिए मत्स्य विभाग इस तालाब का तीन सालाना ठेका देता है। इतना ही नहीं मत्स्य विभाग ने दह (तालाब) को टुकड़ों व विभाजित कर दिया है जिससे इसकी विशालता व सौदर्य में कमी होनी शुरू हो गयी है। यह मटोखर दह हिन्दू-मुस्लिम आस्था का केन्द्र भी है। आज भी लोग यहां पिकनिक मनाने आते है। इस तालाब के निर्माण के संबंध में तरह-तरह की किदंतियां प्रचारित है। कुछ लोग इसे द्वापर काल में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भ्राता बलराम के आदेश पर ग्वाल बालों द्वारा खुदवाया मानते है। कुछ लोग इसे महाबली भीम द्वारा खुदवाया बताते है। कई इसे एक राजा द्वारा दही बेचने वाले के आग्रह पर खुदवाया गया बताते है।
'ख्वाजा बदरूद्दीनÓ नामक फकीर के कहने पर तालाब निर्माण की बात मानने वालों की भी कमी नहीं। प्रमाण के तौर पर तालाब किनारे अवस्थित दरगाह है जो मुस्लिमों एवं हिन्दुओं की आस्था का केन्द्र है। जानकारों का कहना है कि तालाब के उत्तर और दक्षिण की ओर टीले हैए जो इसके वास्तु के लिहाज से द्वापरयुगीन होने की पुष्टि करते हैं। पूर्व में शेखपुरा के रह चुके जिलाधिकारी आनंद किशोर ने इसके सौंदर्यीकरण का प्रयास कियाए जो अधूरा ही रह गया। वर्तमान में पर्यटन विभाग द्वारा सौंदर्यीकरण के प्रयास किये जा रहे है। बहरहाल जिला प्रशासन ने इस रमणीक स्थल के आस-पास के इलाके को पालिटेकनिक कालेज व केन्द्रीय विद्यालय खोले जाने के लिए चिह्नित किया है।
सोनरवा दुर्गा का मंदिर
दशहरा पर देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने का शेखपुरा में इतिहास ढाई सौ साल पुराना है। बताया जाता है कि शहर के स्वर्णकारों ने सबसे पहले सन 1760 के आसपास मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की थी। तब यहां के स्वर्णकार समाज के जाने-माने दाहू सोनार के परदादा ने प्रतिमा स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब वर्तमान में दाहू सोनार का कोई सदस्य शेखपुरा में नहीं है। सबसे पुरानी प्रतिमा के कारण सोनरवा दुर्गा को शेखपुरा की बड़ी महारानी का दर्जा प्राप्त है। पूजा समिति से जुड़े अशोक कुमार स्वर्णकार बताते हैं कि आजादी के काफी साल पहले इस प्रतिमा के विसर्जन जुलूस की शोभा यात्रा को लेकर विवाद हुआ था तो इसका निर्णय इग्लैंड की तत्कालीन महारानी एलिजावेथ ने किया था तथा पूजा समिति के पक्ष का समर्थन किया था। सबसे पहले यह प्रतिमा मड़पसौना में स्थापित की गयी थी। बाद में स्वर्णकार समाज के लोगों ने 1960 के दशक के कमिश्नरी बाजार में स्थायी स्थान दे दिया।
उत्तर भारत का तिरूपती सामस का विष्णुधाम
शेखपुरा जिले बरबीघा थाना क्षेत्र के सामस गांव में स्थित है विष्ण की यह आदमकद प्रतिमा। यह प्रतिमा तिरूपती में स्थित बाला जी प्रतिमा से एक फीट अधिक उंची है तथा इसकी उंचाई सात फिट छह इंच है जिसकी वजह से यह विश्व में पूजी जाने वाली विष्णु की सबसे उंची प्रतिमा है। यह प्रतिमा 1992 में तलाब की खुदाई के क्रम में निकली थी जिसके बाद ग्रामीण स्तर पर एक मंदिर बनाया गया तथा इसको लेकर अभियान चलाया जाने लगा। आखिरकर बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष किशोर कुणाल की नजर इस पर पड़ी और इसको लेकर पहल प्रारंभ कर दिया गया और आखिरकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यहां आकर लोगों को अश्वस्त किया कि इसका विकास पर्यटक क्षेत्र के रूप में किया जाएगा। इस प्रतिमा की खासीयत यह है कि यह पाल काल का बना हुआ बताया जाता है तथा विष्णु के हाथ में शंख, चक्र, गदा और पद्म भी है। इसके विकास को लेकर स्थानीय सांसद भोला ंिसह के द्वारा भी संसद में सवाल उठाया गया था। ठसी को लेकर उत्तर बिहार के तिरूपती कहे जाने वाले जिले के बरबीघा के सामस गांव में स्थित विष्णु की भव्य प्रतिमा को देखने तथा यहां पर्यटन की संभावनाओं को तलाशने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यहां का दौरा किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रतिमा स्थल को विकसीत कर उसे पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करने का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि बिहार के तिरूपती के रूप में विकसीत कर इस क्षेत्र के विकास को लेकर अगले माह में पटना में एक विशेष बैठक बुलाई जाएगी जिसमें मंदिर विकास कमिटि के लोग, जिला प्रशासन, स्थानीय जनप्रतिनिधी तथा धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष के अलावा पुरात्तव से जुडे लोगों के साथ बैठक कर मंदिर के विकास की रूपरेख तय की जाएगी।


Sunday, 30 December 2012

मगध का एक छोटा सा हिस्सा जहानाबाद

 प्रसिद पुस्तक 'आईना.ए.अकबरीÓ में जहानाबाद का जिक्र किया गया है। 17 वीं शताब्दी मे औरंगजेब के शासनकाल में यहाँ एक भीषण अकाल पड़ा था। भूख के कारण प्रतिदिन सैकड़ों लोग काल का ग्रास बन रहे थे। ऐसी परिस्थिति मे मुगल बादशाह ने अपनी बहन जहानआरा के नेतृत्व में एक दल अकाल राहत कार्य हेतु भेजा। जहानआरा के स्मृति मे इस स्थान का नाम जहानआराबाद जो कालांतर मे 'जहानाबादÓ  के नाम से हुआ।  प्राचीनकाल के इतिहास की ओर रुख करें तो यह क्षेत्र मगध का एक छोटा सा हिस्सा था। इस जिला के मखदुमपुर प्रखंड में अवस्थित बराबर पहाड़ भौगोलिक, ऐतिहासिक धार्मिक एवं पर्यटन की दृष्टि से प्राचीन काल से ही अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है।  प्रखंड मुख्यालय से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस पर्वत की चोटी के मध्य मे बाबा सिद्धेश्वरनाथ उर्फ  भगवान शंकर का अत्यंत प्राचीन मन्दिर है। मगध सेनापति बाणावर ने अपने प्रवास के दौरान एक विशाल मन्दिर का निर्माण कराया था। जो आज दबा पड़ा है। इसी पर्वत की चोटी पर सम्राट अशोक ने अपनी एक रानी की मांग पर आजीवक सम्प्रदाय के साधुओं के लिए गुफाओं का निर्माण कराया। जो आज भी उसी स्थिति मे विद्धमान है। ये गुफा, विश्व की प्रथम मानव निर्मित गुफाओं के रुप में जानी जाती है। अशोक के पोत्र दशरथ ने भी बोद्ध भिक्षुओं के लिए कुछ गुफाओं का निर्माण कराया गुफाओं के अदर ग्रेनाइट पत्थर चिकनाहट की कला अभूतपूर्व है। पत्थर छूने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो मिस्त्री अभी उठकर बाहर गए हो। ऐसा माना जाता है कि इसी पर्वत पर खुदा तालाब पर ब्राहण विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ कर बुद्ध यहाँ से फल्गु नदी के मार्ग से बोध-गया गए थे। अत: ऐतिहासिक द्रष्टि से इस स्थान का बहुत महत्व है।
 महत्व के स्थान
भेलावर
  जहानाबाद रेलवे स्टेशन से दक्षिण-पूर्व लगभग 11 किलोमीटर की दूरी पर काको प्रखड  मे भेलावर ग्राम अवस्थित है। यह शिव भगवान के पुराने मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है। ग्राम के बाहर से ही आज भी मन्दिर के आहाते के पथरीले द्वार के बचे हुए भाग को देखा जा सकता है। हिन्दु ओर मुस्लिम काल की कला के नमूने की खोज भी यहाँ की गई है। यहाँ प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि के अवसर पर एक बङा मेला लगता है।
काको
  जहानाबाद रेलवे स्टेशन के लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर जहानाबाद बिहार.शरीफ रोड मे अवस्थित काको प्रखड का मुख्यालय है। स्थानीय कथनानुसार श्री रामचन्द्र के सौतेली माँ रानी केकइ कुछ समय यहाँ वास ग्रहण की थी। उन्हीं के नाम पर इस ग्राम का नाम काको पङा। एक बहुत बङी मुस्लिम सूफिया हजरत बीबी कमाल साहिबा का मकबरा भी इस ग्राम में है। कहा जाता है कि बिहार-शरीफ  के ह्जरत मखदुम साहब की यह चाची थी और रुहानी ताकत रखती थी। बिहार के कोने-कोने से बङी संख्या मे श्रधालु आते है और मनोकामना पाते है। ग्राम के उत्तर-पश्चिम में एक मन्दिर है, जिसमें सूर्य भगवान की एक बहुत पुरानी मूर्ति स्थापित है। प्रत्येक रविवार को बङी संख्या मे लोग पूजा करने के लिए आते है।
भैख
  यह ग्राम मखदुमपुर प्रखड मुख्यालय से लगभग 11 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। यहाँ पहाड़ी की चोटी पर सिधेश्वरनाथ से भगवान शिव का ईश्वरीय प्रतीक है। करना चौपार और सुदामा नाम की दो गुफाएँ,  जिनका सम्बन्ध महाराजा अशोक से है। इस पहाङी पर है। कहा जाता है कि महाराजा अशोक ने इसके निकट ही एक झील बनवाई थी, जिसे पटल-गंगा के नाम से पुकारा जाता है। चीनी यात्री हियुनसांग ने इस स्थान का दर्शन किया था और अपनी यात्रा पुस्तक मे इसका उल्लेख भी किया है।
घेजन
  जहानाबाद में दक्षिण-पूर्व लगभग 19 किलोमीटर की दूरी पर कुर्था प्रखन्ड में स्थित एक प्राचीन ग्राम है। यहाँ एक पुराना गढ है जहाँ गुप्त काल की पत्थर की मूर्तियाँ पाई गई है। इन मूर्तियों को पटना के अजायबघर में सुरक्षित रखा गया है।
आमथुआ
  यह जिला मुख्यालय से 7 कि0 मी0 पूर्व में है। मुगल काल में अमूल्य धरोहर जिसमें मुगल कालीन प्रमाण पर बना एवं सरकारी पथ पाए गए थे। जो फिलहाल पटना के खुदाबख्श लाइब्रेरी पुस्तकालय में मौजूद है। गाँव के दक्षिण मे शेरशाह की बनाई मस्जिद भी है। इसके अतिरिक्त यहाँ बहुतेरे महापुरुषों की कब्रें है जिनमें एक शेख चिस्ती की है।
ओकरी
 यह जिला मुख्यालय से 18 कि0 मी0 उतर-पूर्व में फल्गु नदी के तट पर स्थित है। पूरा गाँव टिलहा पर बसा है। ओकरी परगना इसी गाँव के नाम पर है। इस परगना में फ्रांसिसी बुकानन के काल मे 132000 विगहा जमीन थी। कुछ जगहों पर खुदाई के दरम्यान कई मूर्तियों के साथ ब्राह्यीलिपि अभिलेख वाले 4 स्तम्भ भी प्राप्त हुए है ।
केउर
 जिला मुख्यालय से 30 कि0 मी0 दक्षिण-पूर्व में बसे इस गाँव मे प्रसिद्ध इतिहासकार एवं पुरात्त्वविद ए0 बनर्जी ने 1939 ई0 में इस गाँव का निरीक्षण किया था। यहाँ एक बहुत बडा गढ है। जिसकी ऊचाई 40 फीट है। इस गढ की खुदाई के दरम्यान पाल काल के बहुत सारे मूर्तियाँ मिली है जो 10 वीं एवं 12 वीं सदी की है। खुदाई के क्रम में  यहाँ बड़ी-बड़ी ईटें प्राप्त हुई है। जिसकी लं0 14 इंच चौडाई 8 1ध्2 इंच एवं ऊचाई 3 इंच है। इतिहासकार शास्त्री ने इस गाँव की तुलना नालन्दा से करते हुए कहा था लगता है कि यह पाल कालीन बौद्ध विश्वविद्यालय विक्रमशीला यही अवस्थित है।
दाउदपुर
 यह गाँव जिला मुख्यालय से 28  कि0 मी0 पूर्व में स्थित है। इस गाँव का निरिक्षण फ्रासिसी बुकान्न ने 1811-12 ई0 में तथा ब्राडले ने 1872 में किया था। इनलोगों ने अपने प्रतिवेदन मे बताया है कि इस गाँव का पूर्व में नाम देवस्ति, देव्स्थु,  दप्थु, दाउथु था। यहाँ मिट्टी का गढ भी है तथा गढ के दक्षिण-पूर्व में मुस्लिम संत का मजार है। मजार के दक्षिण-पूर्व में एक विशाल मन्दिर पारसनाथ के नाम से ख्याति प्राप्त है जिसे बौद्ध मन्दिर भी माना जाता है। इस मन्दिर के दक्षिण में वासुदेव,  लक्ष्मीनारायण जगदम्बा नृत्य मुद्रा में पार्वती-शिव की मूर्तियाँ है। ये बातें फ्रांसिसी यात्री बुकानन के द्वारा लिखी गयी थी। लेकिन आज की स्थिति में वहाँ सिर्फ अवशेष मिलेगे। वहाँ की कुछ मूर्तियाँ गया संग्रहालय में उपलब्ध है।

लाट
यह जिला मुख्यालय से करीब 35 कि0 मी0 पूर्व-दक्षिण के कोण पर स्थित है। यहाँ एक गोलाकार लम्बा स्तम्भ है जिसकी लम्बाई 53.5 फीट गोलाई 3.5 फीट व्यास की है। यह उतर से दक्षिण की ओर आधी जमीन में तथा आधी जमीन की सतह पर है। हाल में कुछ पुरातत्वविदों ने इस मरहौली लौह स्तम्भ का साँचा बताया है।
जारु
 जिला मुख्यालय से करीब 40 कि0 मी0 पूर्व-दक्षिण के कोण पर है। यहाँ एक प्राचीन मन्दिर का अवशेष मिला है जो स्थात्व कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। स्थानीय लोग इसे शेरशाह के काल का बताते है। बगल में स्थित पर्वत पर एक बहुत बङा शिवलिंग है। इसे हरिहर नाथ के नाम से जाना जाता है। यहाँ मेला भी लगता है।
धराउत
 जिला मुख्यालय से करीब 22 कि0 मी0 दक्षिण तथा बराबर पहाङी से 05 कि0 मी0 उतर. पूर्व मे स्थित है। यहाँ एक विशाल बौद्ध मठ चीनी यात्री व्हेन-सांग के काल में था। चीनी यात्री व्हेन.सांग ठहरे भी थे। जिसका उल्लेख उन्होंने अपने यात्रा वृतांत में किया है। इस गाँव के ऐतिहासिक एवं पुरातत्व विभाग को देखते हुए कई पुरातत्वविदो ने विभिन्न समयों में यहाँ का निरीक्षण किया है। जिनमे मेजर किट्टी ने 1847 ई0 कलिंघम ने 1862 ई0 और 1880 ई0 में बेलगार ने 1892 ई0, डा0 गिरियेसेन ने 1900 ई0,  डा0 हरिकिशोर ने 1954 में इसका निरीक्षण किया, इस गाँव का पूर्व में कई नाम थे जिनमे धरमपुर, कंचनपुर, धरमपुरी, धरमावर आदि प्रमुख है। यहाँ की बहुत सारी मुर्तियाँ पटना संग्रहालय मे उपलब्ध है। इस गाँव की विगत बहुत सारी टिल्हे एवं गढ है। यदि जिसकी खुदाई की जाए तो इस गाँव में और भी ऐतिहासिक तथ्य सामने आयेगी।
जहानाबाद बिहार की राजधानी पटना से रेलमार्ग द्वारा 45 कि0 मी0 की दूरी तथा सङक मार्ग से 56 कि0 मी0 दूरी पर जहानाबाद का मुख्यालय है। दरधा नदी एवं यमुना नदी के संगम पर स्थित है। सम्पूर्ण जिले की भूमि समतल मैदानी क्षेत्र है। नदियाँ सोन,  पुनपुन,  फक्गु, दरधा और यमुना इस जिले से होकर गुजरती है। सिर्फ सोन नदी एवं पुनपुन नदी जहानाबाद जिले के पश्चिमी किनारे को छूती हुई गुजरती है एवं सदा बहनेवाली नदी है। मौसमी नदियाँ दरधा,  यमुना, ऑर फल्गु कभी-कभी भयानक रुप धारण कर लेती है। फल्गु नदी को हिन्दु समुदाय आदर की नजर से देखते है और इसके किनारे पर अपने पूर्वजों को पिंड दान का धार्मिक कार्य करते है।

प्राचीन जिलों में से एक है बांका

बिहार के प्राचीन जिलों में से एक है बांका। इसका जिला मुख्यालय बांका शहर है। यह जिला विशेष रूप में मकर सक्रांति के अवसर पर चौदह दिनों तक चलने वाले मेले के लिए जाना जाता है। यह मेला मन्दार पर्वत पर लगता है। इसके अतिरिक्त, पापहरणी कुंड, लक्ष्यद्वीप मंदिर, रुपस, अमरपुर, असौटा, ज्येष्ठ गौर मठ और श्रावण मेला आदि यहां के दर्शनीय स्थलों में से हैं।  भारत को स्वतंत्रता दिलाने में भी इस जगह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बांका जिला बिहार राज्य के दक्षिण-पूर्व की ओर स्थित है। यह जिला झारखंड राज्य के गोण्डा जिला के पूर्व और दक्षिण सीमा, जुमई के पश्चिम, मुंगेर जिले के उत्तर-पूर्व और भागलपुर के उत्तरी सीमा से लगा हुआ है। अगर आप घूमने का प्लान बना रहे हैं तो बांका जिला में घूमने के अनेकों स्पॉट हैं,जहां आप आकर बेहतर महशूस करेंगे।

कहां जाएं                                                      

पापहरणी कुंड

 इस प्राचीन कुंड को पापहरणी के नाम से जाना जाता है। इस कुंड तक पहुंचने के लिए पर्वत में तीन रास्ते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार कर्नाटक के राजा यहां पर आए थे और मकर सक्रांति में दिन उन्होंने इस कुंड में स्नान किया था। कुंड में स्नान करने से उनके सभी रोग दूर हो गए थे। कुछ लोगों का मानना था कि उन्हें कोढ़ रोग था। इस पर्वत पर भगवान मधुसूदन का मंदिर भी है। काफी संख्या में लोग प्रतिदिन उनके दर्शनों के लिए यहां आते हैँ। एक अन्य कथा के अनुसार, एक भगवान बुंसी के रास्ते से जा रहे थे तो काल पहर के बाद इस मंदिर को नष्ट कर दिया गया था। माना जाता है कि शायद ऐसा कुछ मुसलमानों ने किया था। इस कारण भगवान मधुसूदन को बुंसी से प्रत्येक वर्ष हाथी पर बैठाकर लाया जाता है और फिर उनकी पूजा कर उन्हें वापिस उनके स्थान पर छोड़ दिया जाता है।
मंदिर के रास्ते में अन्य कई और मंदिर भी है। पापहरणी कुंड के मध्य में महाविष्णु, महालक्ष्मी जैसे खूबसूरत मंदिरों का निर्माण किया गया है। वर्तमान समय में कुछ मंदिर नष्ट हो चुके हैं। इसके अलावा, यहां दो जैन मंदिर भी है। काफी संख्या में जैन धर्म के लोग भगवान बसुपूज्य की आराधना के लिए यहां आते हैं। माना जाता है कि यह स्थान बसुपूज्य की निर्वाण भूमि है। इस पर्वत पर कई अन्य कुंड जैसे आकाश गंगा और सनख कुंड भी है। सबसे अधिक प्रसिद्ध सीता कुंड है। माना जाता है कि देवी सीता ने इस कुंड में स्नान किया था, जिसके पश्चात् इस कुंड को सीता कुंड के नाम से जाना जाता है।
लक्ष्यद्वीप मंदिर
 यह मंदिर अब नष्ट हो चुका है। लेकिन आज भी पर्वत पर इस मंदिर के कुछ अवशेष देखे जा सकते हैं। पूर्व समय में इस मंदिर को एक लाख द्वीपों से जगमगाया गया था। इसके लिए हर घर से एक मोमबत्ती लाई गयी थी। प्राचीन समय में इस क्षेत्र को बलिशा के नाम से भी जाना जाता था। बलिशा पुराण के अनुसारए यह भगवान शिव की सिद्ध पीठ थी। पर्वत के सबसे ऊंचे भाग पर एक विशाल मंदिर स्थित है। इस मंदिर में भगवान राम ने स्वयं भगवान मधुसूदन की स्थापना की थी। वर्तमान समय में स्थित इस मंदिर का निर्माण जहांगीर के समय में करवाया गया था। इस मंदिर को नाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्तए यहां पर एक विद्यापीठ भी है। काफी संख्या में लोग दूर.दूर से यहां ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते हैं। प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के अवसर के यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है।
रुपस
चन्दन नदी के तट पर स्थित यह गांव भागलपुर-दुमका मार्ग के पश्चिम से लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर है। यह काफी प्राचीन गांव है। गांव में देवी काली और दुर्गा का प्राचीन मंदिर है। प्रत्येक वर्ष काली पूजा और दुर्गा पूजा के अवसर पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। काफी संख्या में लोग इस मेले में सम्मिलित होते हैं।
अमरपुर
बांका से लगभग 19 किलोमीटर की दूरी पर अमरपुर खण्ड स्थित है। भागलपुर से अमरपुर 26 किलोमीटर की दूरी पर है। पौराणिक कथा के अनुसारए इस गांव की स्थापना बिहार के गर्वनर शाह उमर वाजिर ने की थी।
असौटा
कहा जाता है कि इस गांव की स्थापना महारानी चन्दरजोती ने की थी। वह खारगपुर से यहां पर आई थी। महारानी ने यहां पर एक किले और असौटा सरोवर कुंड का निर्माण करवाया था। इसके अलावा, उन्होंने अपने पुत्र के लिए यहां एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। कुछ समय बाद यह किला और मस्जिद नष्ट कर दी गई थी।
ज्येष्ठ गौर मठ
 चन्दन नदी के तट पर स्थित यह जगह अमरपुर के पूर्व से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ज्येष्ठ गौर स्थान शिव मंदिर है जो कि पर्वत पर स्थित है। पर्वत के सबसे ऊंचे हिस्से को ज्येष्ठ गौर पहर के नाम से जाना जाता है। यहां पर एक काली मंदिर और प्राचीन कुंआ भी है। प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि के अवसर पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है।
श्रावण मेला
 प्रत्येक वर्ष श्रवण माह में (जुलाई-अगस्त) में भक्त (कावडिय़ा) जब सुल्तानगंज से देवघर से रास्ते जाते हैं तो वह साथ में भगवान शिव को गंगा जल चढ़ाने के लिए ले जाते हैं। पूरे एक माह तक इस मार्ग में भक्तों की काफी भीड़ रहती है।
अनूठा गांव : कुमारडीह
आज जहां मांसाहार के प्रति लोगों का रूझान बढ़ रहा है वहीं बिहार के बांका जिले में आज भी एक ऐसा गांव है जहां नई नवेली दुल्हन को प्रवेश से पूर्व ही शाकाहारी होने का संकल्प लेना पड़ता है।  बांका जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर आराहाट तथा धोरैया प्रखंड की सीमा पर कुमारडीह गांव स्थित है। यहां की आबादी करीब 350 है। यहां अधिकांश लोग यादव जाति के हैं। इस गांव में वधू को प्रवेश से पूर्व आजीवन शाकाहारी होने का संकल्प लेना पड़ता है। यहां मान्यता है कि यदि कोई दुल्हन भूलवश मांस का सेवन कर लेती है तो उसे गंगा स्नान करके ही इस पाप से मुक्ति मिल सकती है। गांव के बुजुर्ग राजेन्द्र यादव की मानें तो गांव में इस परंपरा का चलन काफी पुराना है। उन्होंने बताया कि लगभग दो-ढाई सौ वर्ष पूर्व पूरे गांव में 10 वर्ष तक किसी भी दंपत्ति को संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। तभी कोई बाबा आए जिन्होंने यहां के लोगों को मांसाहार नहीं करने की सलाह दी। तभी से इस गांव में मांसाहार पूरी तरह से बंद है और नई दुल्हनों को भी यहां प्रवेश के पूर्व ही शाकाहरी रहने का संकल्प लेना पड़ता है। यही नहीं अगर इस गांव के लोग अपनी लड़की का विवाह भी तय करते हैं तो उस संबंधी से पहले ही निवेदन किया जाता है कि उनकी बेटी को मांस और मछली खाने के लिए दबाव नहीं डाला जाएगा। वह बताते हैं कि यहां के लोगों की कोशिश तो यही होती है कि किसी ऐसे परिवार में रिश्ता ही नहीं किया जाए जहां मांस का सेवन होता है। वह बताते हैं कि यहां के लोग अपने बेटे या बेटी की शादी तय होने के पूर्व ही इस बात को बता देते हैं। शाकाहार के प्रति निष्ठा का आलम यह है कि यहां के लोग गांव के बाहर भी जाते हैं तो अपने साथ खाने-पीने का सामान साथ ले जाते हैं। यहां के समारोहों में मांस का कोई स्थान नहीं होता है।
कैसे जाएं
वायु मार्ग : यहां का सबसे निकटतम हवाई अड्डा जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। पटना से बांका 263 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग : सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन बांका जंक्शन है। रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से यहां पहुंचा जा सकता है।
सड़क मार्ग : भारत के कई प्रमुख शहरों से बांका सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।

मिथिला प्रदेश का अंग : समस्तीपुर


समस्तीपुर राजा जनक के मिथिला प्रदेश का अंग रहा है। विदेह राज का अंत होने पर यह वैशाली गणराज्य का अंग बना। इसके पश्चात यह मगध के मौर्य, शुंग, कण्व और गुप्त शासकों के महान साम्राज्य का हिस्सा रहा। ह्वेनसांग के विवरणों से यह पता चलता है कि यह प्रदेश हर्षवर्धन के साम्राज्य के अंतर्गत था। 13 वीं सदी में पश्चिम बंगाल के मुसलमान शासक हाजी शम्सुद्दीन इलियास के समय मिथिला एवं तिरहुत क्षेत्रों का बँटवारा हो गया। उत्तरी भाग सुगौना के ओईनवार राजा के कब्जे में था जबकि दक्षिणी एवं पश्चिमी भाग शम्सुद्दीन इलियास के अधीन रहा। समस्तीपुर का नाम भी हाजी शम्सुद्दीन के नाम पर पड़ा है। शायद हिंदू और मुसलमान शासकों के बीच बँटा होने के कारण ही आज समस्तीपुर का सांप्रदायिक चरित्र समरसतापूर्ण है। ओईनवार राजाओं को कलाए संस्कृति और साहित्य का बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। शिवसिंह के पिता देवसिंह ने लहेरियासराय के पास देवकुली की स्थापना की थी। शिवसिंह के बाद यहाँ पद्मसिंह, हरिसिंह, नरसिंहदेव, धीरसिंह, भैरवसिंह, रामभद्र, लक्ष्मीनाथ, कामसनारायण राजा हुए। शिवसिंह तथा भैरवसिंह द्वारा जारी किए गए सोने एवं चाँदी के सिक्के यहाँ के इतिहास ज्ञान का अच्छा स्त्रोत है। अंग्रेजी राज कायम होने पर सन 1865 में तिरहुत मंडल के अधीन समस्तीपुर अनुमंडल बनाया गया। बिहार राज्य जिला पुनर्गठन आयोग के रिपोर्ट के आधार पर इसे दरभंगा प्रमंडल के अंतर्गत 14 नवम्बर 1972 को जिला बना दिया गया। अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध हुए स्वतंत्रता आंदोलन में समस्तीपुर के क्रांतिकारियों ने महती भूमिका निभायी थी। यहाँ के कर्पूरी ठाकुर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं।
विद्यापतिनगर, मालीनगर, मंगलगढ़, जगेश्वर स्थान, पूसा, मुसरीघरारी, हसनपुर मार्ग और थानेश्वर मंदिर आदि यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से है। इस जिले का संबंध प्रसिद्ध मैथिली कवि विद्यापति और प्रसिद्ध उपन्यासकार देवकी नन्दन खत्री से रहा है। यह जिला बागमती नदी के उत्तर, वैशाली और मुजफ्फरपुर जिले के कुछ भाग के पश्चिम, गंगा नदी के दक्षिण और बेगुसराय तथा खगरिया जिले के कुछ हिस्से के पूर्व से घिरा हुआ है। इसका जिला मुख्यालय समस्तीपुर शहर है।
पर्यटन स्थल
विद्यापतिनगर
शिव के अनन्य भक्त एवं महान मैथिल कवि विद्यापति ने यहाँ गंगा तट पर अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे। ऐसी मान्यता है कि अपनी बीमारी के कारण विद्यापति जब गंगातट जाने में असमर्थ थे तो गंगा ने अपनी धारा बदल ली और उनके आश्रम के पास से बहने लगी। वह आश्रम लोगों की श्रद्धा का केंद्र है।
करियन
महामहिषी कुमारिलभट्ट के शिष्य महान दार्शनिक उदयनाचार्य का जन्म 984 ईस्वी में शिवाजीनगर प्रखंड के करियन गाँव में हुआ था। उदयनाचार्य ने न्याय, दर्शन एवं तर्क के क्षेत्र में लक्षमणमाला, यायकुशमांजिली, आत्मतत्वविवेक, किरणावली आदि पुस्तकें लिखी जिनपर अनगिनत संस्थानों में शोध चल रहा है। दुर्भाग्य से यह महत्वपूर्ण स्थल सरकार की उपेक्षा का शिकार है।
मालीनगर
यहाँ 1844 में बना शिवमंदिर है जहाँ प्रत्येक वर्ष रामनवमी को मेला लगता है। मालीनगर हिंदी साहित्य के महान साहित्यकार बाबू देवकी नन्दन खत्री एवं शिक्षाविद राम सूरत ठाकुर की जन्म स्थली भी है।
मंगलगढ
यह स्थान हसनपुर से 14 किलोमीटर दूर है जहाँ प्राचीन किले का अवशेष है। यहाँ के स्थानीय शासक मंगलदेव के निमंत्रण पर महात्मा बुद्ध संघ प्रचार के लिए आए थे। उन्होंने यहाँ रात्रि विश्राम भी किया था। जिस स्थान पर बुद्ध ने अपना उपदेश दिया था वह बुद्धपुरा कहलाता था जो अब अपभ्रंश होकर दूधपुरा हो गया है।
जगेश्वरस्थान (बिभूतिपुर)
नरहन रेलवे स्टेशन से 15 किलोमीटर की दूरी पर बिभूतिपुर में जगेश्वरीदेवी का बनवाया शिव मंदिर है। अंग्रेजों के समय का नरहन एक रजवाड़ा था जिसका भव्य महल बिभूतिपुर में मौजूद है। जगेश्वरी देवी नरहन स्टेट के वैद्य भाव मिश्र की बेटी थी।
मोरवा अंचल में कुंदनेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना एक मुस्लिम द्वारा यहाँ शिवलिंग मिलने पर की गयी थी। मंदिर के साथ ही महिला मुस्लिम संत की मजार हिंदू और मुस्लिम द्वारा एक साथ पूजित है
मुसरीघरारी
राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर स्थित यह एक कस्बा है जहाँ का मुहरर्म तथा दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन होता है।
संत दरियासाहेब का आश्रम
बिहार के सूफी संत दरिया साहेब का आश्रम जिले के दक्षिणी सीमा पर गंगा तट पर बसा गाँव धमौन में बना है। यहाँ निरंजन स्वामी का मंदिर भी है। थानेश्वर शिवमंदिर, खाटू-श्याम मंदिर एवं कालीपीठ समस्तीपुर जिला मुख्यालय का महत्वपूर्ण पूजा स्थल है।
यातायात सुविधाएँ
सड़क मार्ग
समस्तीपुर बिहार के सभी मुख्य शहरों से राजमार्गों द्वारा जुड़ा हुआ है। यहाँ से वर्तमान में दो राष्ट्रीय राजमार्ग तथा तीन राजकीय राजमार्ग गुजरते हैं। मुजफ्फरपुर, मोतिहारी होते हुए लखनऊ तक जानेवाली राष्ट्रीय राजमार्ग 28 है। राष्ट्रीय राजमार्ग 103 जिले को चकलालशाही, जन्दाहा, चकसिकन्दर होते हुए वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से जोड़ता है। हाजीपुर से राष्ट्रीय राजमार्ग 19 पर महात्मा गाँधी सेतु पारकर राजधानी पटना जाया जाता है। जिले में राजकीय राजमार्ग संख्या 49ए 50 तथा 55 की कुल लंबाई 87 किलोमीटर है।
रेल मार्ग
समस्तीपुर भारतीय रेल के नक्शे का एक महत्वपूर्ण जंक्शन है। यह पूर्व मध्य रेलवे का एक मंडल है। दिल्ली-गुवाहाटी रूट पर स्थित रेललाईनें एक ओर शहर को मुजफ्फरपुर,हाजीपुर, छपड़ा होते हुए दिल्ली से और दूसरी ओर बरौनी, कटिहार होते हुए गुवाहाटी से जोड़ती है। इसके अतिरिक्त यहाँ से मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, जम्मू, अमृतसर, गुवाहाटी तथा अन्य महत्वपूर्ण शहरों के लिए सीधी ट्रेनें उपलब्ध है।
वायु मार्ग:
समस्तीपुर का निकटस्थ हवाई अड्डा 65 किलोमीटर दूर पटना में स्थित है। लोकनायक जयप्रकाश हवाई क्षेत्र पटना से अंतर्देशीय तथा सीमित अन्तर्राष्ट्रीय उड़ाने उपलब्ध है। इंडियन, किंगफिशर, जेट एयर, स्पाइस जेट तथा इंडिगो की उड़ानें दिल्ली, कोलकाता और राँची के लिए उपलब्ध हैं।

Saturday, 29 December 2012

हिरणों का वन : सारंग अरण्य यानि सारन


महाजनपद काल में सारन की भूमि कोसल का अंग रहा है। कोसल राज्य के उत्तर में नेपाल, दक्षिण में सर्पिका (साईं) नदी, पुरब में गंडक नदी तथा पश्चिम में पांचाल प्रदेश था। इसके अंतर्गत आज के उत्तर प्रदेश का फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, गोरखपुर तथा देवरिया जिला के अतिरिक्त बिहार का सारन क्षेत्र आता है। आठवीं सदी में यहाँ पाल शासकों का आधिपत्य था। जिले के दिघवारा के निकट दुबौली से महेन्द्रपाल देव के समय 898 ईस्वी में जारी किया गया ताम्रफलक प्राप्त हुआ है।
सारन की भूमि वनों के असीम विस्तार और इसमें विचरने वाले हिरणों के कारण प्रसिद्ध था। हिरण (सारंग) एवं वन (अरण्य) के कारण इसे सारंग अरण्य कहा गया जो कालक्रम में बदलकर सारन हो गया। ब्रिटिस विद्वान जेनरल कनिंघम ने यह ऐसी धारणा व्यक्त की है कि मौर्य सम्राट अशोक के काल में यहाँ लगाए गए धम्म स्तंभों को 'शरणÓ कहा जाता था जो बाद में सारन कहलाने लगा और इस क्षेत्र का नाम बन गया। सारन का मुख्यालय छपरा काफी प्रसिद्ध रहा है और अक्सर इसे छपरा जिला भी कहा जाता है।भारत के प्रथम राष्टï्रपति यही के रहने वाले हैं।
पर्यटन स्थल
सोनपुर मेला
हाजीपुर के सामने सोनपुर में प्रत्येक वर्ष लगने वाला पशु मेला विश्व प्रसिद्ध है। सोनपुर एक नगर पंचायत और पूर्व मध्य रेलवे का मंडल है। इसकी प्रसिद्धि लंबे रेलवे प्लेटफार्म के कारण भी है। भागवत पुराण में वर्णित इस हरिहर क्षेत्र में गज-ग्राह की लडाई हुई थी जिसमें भगवान विष्णु ने ग्राह (घरियाल) को मुक्ति देकर गज (हाथी) को जीवनदान दिया था। उस घटना की याद में प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को गंडक स्नान तथा एक पक्ष तक चलनेवाला मेला लगता है। यहाँ बाबा हरिहरनाथ (शिव मंदिर) तथा काली मंदिर के अलावे अन्य मंदिर भी हैं। मेला के दिनों में सोनपुर एक सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक केंद्र बन जाता है।
चिरांद :
 छपरा से 11 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में डोरीगंज बाजार के निकट स्थित यह गाँव एक सारन जिले का सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। घाघरा नदी के किनारे बने स्तूपनुमा भराव को हिंदू, बौद्ध तथा मुस्लिम प्रभाव एवं उतार-चढाव से जोड़कर देखा जाता है। भारत में यह नव पाषाण काल का पहला ज्ञात स्थल है। यहाँ हुए खुदाई से यह पता चला है कि यह स्थान नव-पाषाण काल  (2500.1345 ईसा पूर्व) तथा ताम्र युग में आबाद था। खुदाई में यहाँ से हडडियाँ, गेंहूँ की बालियाँ तथा पत्थर के औजार मिले हैं जिससे यह पता चलता है कि यहाँ बसे लोग कृषि, पशुपालन एवं आखेट में संलग्न थे।
 स्थानीय लोग चिरांद टीले को द्वापर युग में ईश्वर के परम भक्त तथा यहाँ के राजा मौर्यध्वज (मयूरध्वज) के किले का अवशेष एवं च्यवन ऋषि का आश्रम मानते हैं। 1960 के दशक में हुए खुदाई में यहाँ से बुद्ध की मूर्तियाँ एवं धम्म से जुड़ी कई चीजें मिली है जिससे चिरांद के बौद्ध धर्म से लगाव में कोई सन्देह नहीं।
मांझी : छपरा शहर से 20 किलोमीटर पश्चिम गंगा के उत्तरी किनारे पर प्राचीन किले का अवशेष है। यहाँ से प्राप्त दो मूर्तियों को स्थानीय मधेश्वर मंदिर में रखी गई है। इनमें एक मूर्ति भूमि स्पर्श मुद्रा मे भगवान बुद्ध की है जो मध्य काल में बनी मालूम पड़ती है। टीले के पूर्व बने कम ऊँचाई वाले खंडहर को स्थानीय लोग राजा की कचहरी बुलाते हैं। अबुल फजल लिखित आईना.ए.अकबरी में मांझी को एक प्राचीन शहर बताया गया है। ऐसी धारणा भी है कि इस जगह का नाम चेरों राजा माँझी मकेर के नाम पर पड़ा है।
अंबा स्थान, आमी : छपरा से 37 किलोमीटर पूर्व तथा दिघवारा से 4 किलोमीटर दूर आमी में प्राचीन अंबा स्थान है। दिघवारा का नाम यहाँ स्थित एक दीर्घ (बड़ा) द्वार के चलते पड़ा है। आमी मंदिर के पास एक बगीचे में कुँआ बना है जिसमें पानी कभी नहीं सूखता। इस कुएँ को यज्ञ कुंड माना जाता है और नवरात्र (अप्रैल और अक्टुबर) के दिनों में दूर-दूर से लोग जल अर्पण करने आते हैं।
दधेश्वरनाथ मंदिर : पारसगढ से उत्तर धोर आश्रम में पुरातात्विक महत्व के कई वस्तुएं दिखाई पड़ती है। गंडक के किनारे भगवान दधेश्वरनाथ मंदिर है जहाँ पत्थर का विशाल शिवलिंग स्थापित है।
गौतम स्थान : छपड़ा से 5 किलोमीटर पश्चिम में घाघरा के किनारे स्थित रिवीलगंज (पुराना नाम-गोदना) में गौतम स्थान है। यहाँ दर्शन शास्त्र की न्याय शाखा के प्रवर्तक गौतम ऋषि का आश्रम था। हिंदू लोगों में ऐसी आस्था है कि रामायण काल में भगवान राम ने गौतम ऋषि की शापग्रस्त पत्नी अहिल्या का उद्धार किया था। ऐसी ही मान्यता मधुबनी जिले में स्थित अहिल्यास्थान के बारे भी है।
बाबा शिलानाथ मंदिर : मढौरा से 28 किलोमीटर दूर सिल्हौरी के बारे में ऐसी मान्यता है कि शिव पुराण के बाल खंड में वर्णित नारद का मोहभंग इस स्थान पर हुआ था। प्रत्येक शिवरात्रि को बाबा शिलानाथ के मंदिर में जलार्पण करनेवाले भक्त यहाँ जमा होते हैं।
जीरादेई

कहते हैं कि प्रत्येक चमकने वाली वस्तु सोना नहीं हुआ करती। इसी तरह साधारण दिखने वाले व्यक्ति में कितना असाधारण व्यक्तित्व छिपा हैए कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं।  बिहार के जिला सारन के एक गांव जीरादेई में जन्मे राजेन्द्र प्रसाद एक ऐसे व्यक्ति थे जो किसान के परिवार से आते थे और उन्होंने जीवन की हर कड़वी सच्चाई को नजदीक से देखा था। उनके पिता श्री महादेव सहाय संस्कृत एवं फारसी के विद्वान थे एवं उनकी माता श्रीमती कमलेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं जिनके संस्कारों में पलकर राजेन्द्र प्रसाद का बचपन बीता। इन्हीं संस्कारों का नतीजा था जो राजेन्द्र प्रसाद जी में सादगी और सहजता के गुणों का सृजन हुआ। सादगी, सरलता, सत्यता एवं कत्र्तव्यपरायणता आदि उनके जन्मजात गुण थे। चंपारन के किसानों को न्याय दिलाने में गांधीजी ने जिस कार्यशैली को अपनायाए उससे राजेन्द्र बाबू अत्यंत प्रभावित हुएण् बिहार में सत्याग्रह का नेतृत्व राजेन्द्र बाबू ने किया। उन्होंने गांधी जी का संदेश बिहार की जनता के समक्ष इस तरह से प्रस्तुत किया कि वहां की जनता उन्हें 'बिहार का गांधीÓ ही कहने लगी। आगे चलकर उनकी लोकप्रियता, सादगी और निष्टा की वजह से ही उन्हें निर्विवाद रुप से देश का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया। गांधीजी ने एक बार कहा था। मैं जिस भारतीय प्रजातंत्र की कल्पना करता हूं, उसका अध्यक्ष कोई किसान ही होगा। और स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत के सर्वोच्च पद के लिए जनता के प्रतिनिधियों ने एकमत होकर राष्ट्रपति पद के लिए जब राजेन्द्र प्रसाद  को चुना तो उनका यह कथन भी साकार हो गया। यहां आकर आप काफी गौरणान्वित होंगे।

महाकाव्य महाभारत से जमुई का संबंध

जमुई बिहार के जमुई जिला का मुख्यालय है। यह जैनों के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। प्राचीन समय में इस जगह को जूम्भिकग्राम और जमबुबानी के नाम से जाना जाता था। ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से यह स्थान काफी महत्वपूर्ण रहा है। सेंट थॉमस चर्च, गुरूद्वारा पक्की संगत, मिन्टो टॉवर, जैन मंदिर धर्मशाला, चन्द्रशेखर संग्रहालय और काली मंदिर आदि यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से हैं। माना जाता है कि 24वें र्तीथकर भगवान महावीर ने उज्जिहवलिया नदी के तट पर स्थित जूम्भिकग्राम में दिव्य ज्ञान प्राप्त किया था। इस जिले की स्थापना गुप्त, पाल और चन्देल शासकों ने की थी। जमुई का संबंध प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत से भी जोड़ा जाता है।
मुख्य आकर्षण
 सेंट थॉमस चर्च
जमुई के दक्षिण-पूर्व से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सेंट थॉमस चर्च एक कैथोलिक चर्च है। इसकी स्थापना 1950 ई. में फ्रेंच साइस एस. जे ने की थी। इस चर्च के प्रथम पादरी थॉमस वेट्टीकेड थे।
गुरूद्वारा पक्की संगत
जमुई जिले के मोगहार स्थित गुरूद्वारा पक्की संगत प्राचीन गुरूद्वारों में से है। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां सिक्खों के नौवें गुरू, गुरू तेग बहादुर कुछ समय के लिए ठहरें थे। गुरूद्वारे में एक कमरा है। माना जाता है कि इस कमरे में रखे हुए तकिया और कोट को गुरू जी ने प्रयोग किया था। गुरूद्वारे के समीप पर ही एक पुराना किला भी है।
मिन्टो टॉवर
जमुई जिला मुख्यालय के पूर्व से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गिद्धौर में मिन्टो टॉवर है। यह टॉवर बिहार के प्रमुख पयर्टन स्थलों में से है। मिन्टो टॉवर का निर्माण महाराजा रामेश्वर प्रसाद सिंह ने करवाया था। यह टॉवर लॉर्ड मिन्टो, भारत के गर्वनर जर्नल और वाइसराय की याद में बनवाया गया थाए जो 10 फरवरी 1960 ई. में यहां घूमने के लिए आए थे। काफी संख्या में पर्यटक यहां आना पसंद करते है। मिन्टो टॉवर के समीप ही एक मंदिर भी है।
जैन मंदिर धर्मशाला
जमुई के पश्चिम से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिंकदरा में जैन मंदिर और एक धर्मशाला स्थित है। इस धर्मशाला में कुल 65 कमरें है। मंदिर स्थित यह धर्मशाल जैन भक्तों को रहने की सुविधा उपलब्ध कराती है। यह धर्मशाल मंदिर के भीतर स्थित है। जैन मंदिर भगवान महावीर को समर्पित है। काफी संख्या में लोग मंदिर में आते हैं। इसके अलावा यह स्थान भगवान महावीर के जन्म स्थान के रूप में भी जाना जाता है।
चन्द्रशेखर संग्रहालय
चन्द्रशेखर संग्रहालय मल्टी-परपस म्यूजियम है। इसकी स्थापना 1985 ईण् में हुई थी। जमुई स्थित चन्द्रशेखर संग्रहालय की स्थापना प्रोफेसर डां. श्यामनंदन प्रसाद ने की थी। पुरातात्विक वस्तुएं, टेरीकोटा सील और प्राचीन चट्टान आदि इस संग्रहालय में देखी जा सकती है। इसके अतिरिक्तए संग्रहालय में भगवान विष्णुए भगवान सूर्या, देवी उमा और दुर्गा की अनेक प्रतिमाएं देखी जा सकती है। यह संग्रहालय चन्द्रशेखर सिंह संग्रहालय के नाम से प्रसिद्ध है। यह संग्रहालय प्रत्येक दिन खुला रहता है। केवल सोमवार को अवकाश रहता है। खुलने का समय : सुबह 10 बजे से शाम 4.30 बजे तक
 काकनकाकन
जुमई के उत्तर से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह जगह धार्मिक केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध है। माना जाता है कि जैनों के नौवें तीर्थंकर सुविधिनाथ का जन्म इसी स्थान पर हुआ था। प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में भक्त यहां आते हैं। इसके अलावा यहां लोगों के लिए रहने की सुविधा भी प्रदान की गई है। प्रसिद्ध जैन मंदिर कुमार ग्राम प्राचीन देवी मंदिर के लिए जाना जाता है। माना जाता है कि इंदापी जिसे इंद्रप्रस्थ के नाम से भी जाना जाता है, वह भी यहां घूमने के लिए आए थे।
काली मंदिरकाली मंदिर जुमई जिले के मालयपुर गांव स्थित है। यह मंदिर देवी काली को समर्पित है। प्रत्येक वर्ष इस जगह पर बहुत ही प्रसिद्ध मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले को काली मेला के नाम से जाना जाता है।


सिमुलतला 
जिला मुख्यालय से लगभग 52 किलो मीटर दूरी पे  मिनी शिमला के नाम से विख्यात सिमुलतला सुंदर व मनोरम छठाओं से घिरा एक सुन्दर स्थल है। यहां ठंड के दिनों में पर्यटक सिमुलतला की हरे भरे बाग बगीचे व सुन्दर-सुन्दर झरने व पहाड़ों का दीदार करते हैं। यहां की जलवायु की प्रशंसा अपने संपूर्ण भ्रमण
पुस्तक में स्वामी विवेकानंद ने खूद की है। और लिखा है सर्वोत्तम जलवायु सिमुलतला की है। स्वामी विवेकानंद  जी दो दफा सिमुलतला का भ्रमण किये  है। वर्तमान समय में पश्चिम बंगाल के कई नामी गिरामी लोगों का भव्य मकान सिमुलतला की पर्यटक व्यवसाय को जीवित करता है। पर्यटकों के सिमुलतला में आने से कई बेरोजगारों को इससे जुड़ी रोजगार मिलता है
पंचपहारी
 जिले के सोनो प्रखंड से 3 किलो मीटर की दुरी पे स्तिथ  है। यह जगह छोटे-बड़े पहाड़ो से पूरा घिरा हुआ है। यहाँ का मुख्य आकर्षण बेंगा पहाड़ हे जो की मेढक की तरह दीखता है इस पहाड़ के ऊपर भगवन शिव जी का एक मंदिर भी है भगवन शिव के अलावा माता दुर्गा, हनुमान जी का भी मंदिर है। यहाँ पे लोग नया साल एमकर संक्रांति के दिन हजारों की संख्या में जमुई जिला और राज्य के दुसरो जिलों के भी लोग घुमने आते है। यहाँ के लोग अपने घर आये हुए मेहमानों को इस प्राकृतिक स्थल का दर्शन कराना नहीं भूलते  है
आवागमन
वायु मार्ग
यहां का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट, पटना है। पटना से जमुई 161 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अतिरिक्त गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा भी है। गया से जमुई 136 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग
जमुई रेलमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से पहुंचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन जमुई जंक्शन है।
सड़क मार्गभारत के कई प्रमुख शहरों से सड़कमार्ग द्वारा जमुई आसानी से पहुंचा जा सकता है।