मध्य प्रदेश में भेडिय़ों और काले हिरणों के लिए सबसे बड़े कुदरती आवास के रुप में प्रसिद्ध 'नौरादेेही अभयारणÓ अब किस्म-किस्म के देशी तथा विदेशी परिंदों के जन्नत के रुप में नई पहचान बनता जा रहा है। संभावना है कि आने वाले समय में बुंदेलखण्ड भी परिंदों का दीदार करने वाले तथा उनके दीवाने सैलानियों का पसंदीदा पड़ाव बन जाए। बुंदेलखण्ड अंचल के जंगलों के अधिकारियों का मानना है कि प्रदेश के इस सबसे बड़े अभयारण में हिरण, चीतल, जंगली भैसा, मगरमच्छ, बंदर, चौसिंघा तथा अन्य जंगली जानवरों के अलावा रंग-बिरंगे देशी और विदेशी परिदों के पसंदीदा आशियाना बननेे से परिंदों के दीवानों के यहां आने की संभावना बढती जा रही है। बुंदेलखण्ड के तीन जिलों, सागर, नरसिंहपुर तथा दमोह के 1197 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला नौरादेही अभयारण सैलानियों को लुभाने वाला यह क्षेत्र हालांकि अब तक देश के पर्यटन के नक्शे पर कोई खास पहचान नहीं बना पाया है लेकिन 'देर आयद दुरुस्त आयदÓ की तर्ज पर ही सही जंगल महकमें ने इस वर्ष एक अक्टूबर से शुरु हुए वन्य प्राणी सप्ताह के दौरान आम जनता को जंगलों की कुदरती खूबसूरती से रुबरु कराने के लिए Óजंगल करवाÓ नाम से नियमित पर्यटन बस सेवा शुरु की है। सागर वन क्षेत्र के मुख्य वन संरक्षक अजीत श्रीवास्तव की माने तो नोरादेही अभयारण में सैलानियों को भले ही बाघ के दर्शन न हो पाएं लेकिन अभयारण का छेवला तालाब, मूलराघाट, बरगयाव तालाब, तेंदूघाट व रगेडा घाट पर उन्हें देश विदेश के एक से बढ़कर एक दुर्लभ प्रजातियों के पक्षियों की अठखेलियां तथा कलरव के दिलकश नजारे देखने को मिल सकते हैं। उत्तराखंड के देहरादून स्थित वन्यजीव संस्थान भी नौरादेही मे 100 से ज्यादा प्रजाति के पक्षियों मौजूदगी की पुष्टि कर चुका है। इसके अलावा जंगल की कुदरती खूबसूरती, झरने, नदी हरियाली के साथ साथ हिरण, चौसिंघा, मगरमच्छ व नीलगाय जैसे जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास में रहने तथा विचरण करते देखना भी किसी रोमांच से कम नहीं होता। नौरादेही अभयारण के वनमण्डल अधिकारी जे. देव प्रसाद ने बताया कि अभयारण में करीब 150 किस्म के परिंदो को देखा जा सकता है। इतना ही नहीं इनमें से 125 किस्म के परिदों का सचित्र सिलसिलेवार ब्योरा भी एकत्रित किया जा सकता है। विदेशी परिंदे खास तौर पर शीत ऋृतु में यहां भ्रमण करने आते हैं। देव प्रसाद के मुताबिक छेवला तालाब अभयारण का एक ऐसा स्थल बनता जा रहा है जहां करीब करीब सभी प्रजातियों के पक्षियों को एक साथ अठखेलियां करने और चहचहाने के नजारे देखे जा सकते हैं। इस तालाब पर सैर करने के लिए आने वाले परिंदो में से करीब दो दर्जन दुर्लभ प्रजाति के है। इन परिंदों में सुलतान बुलबुल (एशियन पैराडाईज फ्लाईकैचर), गंगुला (एशियन ओपनबिल), सुरमाल (ब्लैक स्टाक), छोटा कठफोडवा (इजिप्शियन वल्चर), छोटा गरुड़ (लेसर एड्जुटेण्ट), छोटी पंडुब्बी (लिटिल ग्रेब), सुराखिया (लिटिल इरिगिट), दूधराज, टिटहरी, पहाड़ी भुजंग, कटसरंग व रामचिरैया (किंगफिशर) सहित अन्य परिंदें शामिल हैं। प्रवासी पक्षियों में साइबेरियन सारस (क्रेन), छोटी मुगावी (कामन टील), सीखपर (नार्दन पिनटेल), मायले (गडवेल), सहित अन्य के नाम शामिल हैं। नोरादेही अभयारण में आने वाले परिंदों के व्यवहार का अध्ययन कर रहे आर के तिवारी के मुताबिक दूसरे देशों से आनेवाले अनेक पक्षियो्रं के समूह में से कुछ सदस्य तो ऐसे है जो एक बार नौरादेही अभयारण आने के बाद जाड़ा खत्म होने पर भी वापस वतन को नहीं लौटे। इससे ऐसा लगता है उनको यहां की आबोहवा इतनी रास आई कि नौरादेही अभयारण को ही उन्होने अपना स्थाई बसेरा बना लिया है। बहरहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि अगर देश विदेश के परिंदों की पसंदीदा आशियाने की तलाश बुंदेलखण्ड के जंगलों में पूरी हो रही है तो नए नए खूबसूरत परिंदो के देखने के शौकीन सैलानियों तथा अध्एताओं की यात्रा में बुंदेलखण्ड भी एक अहम पडाव बनेगा। वन प्रेमियों का कहना है कि जंगल विभाग इस स्थान को ऐसा बना दे जो परिंदो को न केवल भोजन तथा प्रजनन के लिहाज से मुफीद लगे बल्कि उनके लिए सुरक्षित भी साबित हो सके।
Tuesday, 11 December 2012
तीर्थों का मुख पुष्कर
पुष्कर की गणना पंचतीर्थों व पंच सरोवरों में की जाती है। यहां का मुख्य मंदिर ब्रम्हाजी का है,जो कि पुष्कर सरोवर से थोड़ी दूरी पर है। ब्रम्हाजी की दाहिनी ओर सावित्री और बांयी ओर गायत्री का मंदिर है। पास में ही एक और सनकादि की मूर्तियां है,तो एक छोटे से मंदिर में नारद जी की मूर्ति। एक मंदिर में हाथी पर बैठे कुबेर तथा नारद की मूर्तियां है। पुष्कर में दुनिया के सबसे बड़े ऊंचे ऊंट मेले के रूप में जाना जाता है। यह मेला सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। राजस्थान में स्थित पुष्कर तीर्थ स्थल न केवल अपने धार्मिक महत्व के कारण जाना जाता है, बल्कि इस तीर्थ स्थल का प्राकृतिक सौन्दर्य और धार्मिक वातावरण में मेला का आयोजन इसकी सुन्दरता में चार चांद लगा देता है।
राजस्थान में कई पर्यटन स्थल है। जिनमें से पुष्कर एक है। पुष्कर झील अजमेर नगर से ग्यारह किमी उत्तर में स्थित है। पुष्कर को तीर्थों का मुख माना जाता है। जिस प्रकार प्रयाग को तीर्थराज कहा जाता है।
पुष्कर को वेदमाता गायत्री की स्थली भी है। यह कई देवी-देवताओं की धर्म स्थली भी यही स्थान है। इस स्थल के महत्व को इसी बात से जाना जा सकता है, कि पुष्कर तीर्थो में गुरु कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार चार धाम की यात्रा अधूरी मानी जाती है, जब तक की पुष्कर की यात्रा न की जायें। इसे पांचवाम धाम कहना कुछ गलत न होगा।
पुष्कर में प्रतिवर्ष दो बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है, जिसमें से एक मेला अन्तर्राष्ट्रिय ख्याति प्राप्त है। यहां के मेले न केवल मेल-मिलाप के संयोग देते है साथ ही यह राजस्व कर के बड़े स्त्रोत है। इनमें से पहला मेला कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरु होकर, कार्तिक मास की पूर्णिमा तक रहता है। दूसरा मेला वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक रह्ता है। इन मेलों का प्रारम्भ पुष्कर झील की छतरी पर ध्वजारोहण व महा आरती से होती है। पुष्कर मेला राजस्थान की लोक संस्कृति का झलक देता है। इस धार्मिक मेले के अंतिम दिन तीर्थनगरी पुष्कर में लाखों की संख्या में लोग आते है। मेले में शामिल होने आये लोग इस झील सरोवर में स्नान कर स्वयं को धन्य करते है। इस मेले की प्रतिक्षा केवल भारत के विभिन्न राज्यों के निवासी ही नहीं, बल्कि अमेरिका,फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, जर्मनी, आस्ट्रेलिया और पौलेण्ड के निवासियों भी करते है। राजस्थान की लोक सांस्कृतिक, रंगारंग कार्यक्रम और मेले में, अलग-अलग तरह के झूले लोगों को सदा से ही अपनी ओर आकर्षित करते रहे है।
इतिहास पर एक नजर
तीर्थराज पुष्कर भारत के प्राचीनतम नगरों में से एक है। कहते हैं कि हड़प्पा और
मोहनजोदड़ों महानगर के निर्माण में पुष्कर के खानों से सीसा भेजा जाता था। लिहाजा कह सक ते हैं कि पुष्कर राजस्थान का डिस्ट्रिस्टगजेरिया यानी सिंधु घाटी की सभ्यता से भी प्राचीन था। पद्म पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने पुष्कर तीर्थ की स्थापना से सृष्टि के निर्माण का शुभारंभ कि या। इसे धरती क ा के ंद्र मानते हैं। वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि मेनक ा अप्सरा ने पुष्क र सरोवर में स्नान कर विश्वामित्र को सम्मोहित किया था। कालिदास की महानायिका शकुंतला का जन्म यहीं हुआ। गायत्री मंत्र की रचना पुष्कर में हुई। इसी तरह मार्कण्डेय ऋषि ने 'महामृत्युंजय मंत्रÓ क ी रचना यहीं क ी। दशावतार में मत्स्य, कू र्म और वराह अवतार भी पुष्क र में हुए। भगवान श्रीराम भी पधारे यहां गरु ड़, पद्म, हरिवंश पुराणों के अनुसार भगवान राम दो बार पुष्कर भी आए थे। दशरथ का श्राद्ध क रने, अगस्त्य ऋ षि से समुद्र सोखने और लंक ा विजय क ी मंत्र दीक्षा लेने। वह स्थान आज भी राम झरोखा के नाम से मशहूर है। राजस्थानी निजाम के अनुसार, 'आदित्य हृदय स्त्रोतÓ क ी दीक्षा पुष्क र में ही दी थी। भगवान कृ ष्ण ने भी पुष्कर प्रवास कि या था। उनसे जुड़े स्थान नंदगांव, गोकु ल, क ान्ह हथाई आज भी स्थित हैं। पुष्क र तीर्थ पर अनुसंधान क रने वाले आचार्य पं. ठाकु र प्रसाद पराशर ने विभिन्न प्राचीन धर्म ग्रंथों से साक्ष्य प्रमाणित कि ए हैं। इनके अनुसार 'महाभारतÓ में युधिष्ठिर क ी पुष्क र यात्रा क ा उल्लेख है। टोंक के प्रो. शिव शर्मा और डॉ. शरद हेवालक र के अनुसार, पुष्क र क भी बौद्ध और जैन धर्माचार्यों क ा पवित्रधाम था। जैन विद्वान इसे पद्मावती नगरी क हते थे। प्राचीन शिला लेखों में इसे क ोंक ण तीर्थ क हा गया है। क भी पुष्क र में बौद्ध विश्वविद्यालय हुआ क रता था। पुष्क र क ी संघरक्षिता बुढऱक्षिता ने सांची के स्तूपों में प्रकोष्ठ बनवाए। पुष्क र में गुरु नानक , गुरु गोविन्द सिंह, स्वामी दयानंद सरस्वती से लेक र महात्मा गांधी तक पधारे। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार हूण तोरमण ने पुुष्क र झील क ो मिट्टी से पाट दिया। बाद में मंडोर के राजा नाहर राव परिहार ने उत्खनन क र प्रतिष्ठित कि या। मुगल शासक ों क ो प्रिय था पुष्क र मुगल शासक ों क ो पुष्क र क ाफ ी रास आया। जहांगीर क ो तो पुष्क र इतना भाया कि उसने तेरह बार पुष्क र क ी यात्राएं क ी और यहां के पंडितों क ो जागीरें दान दीं। आज भी पुष्क र झील के दूसरे कि नारे जहांगीर द्वारा निर्मित बारहदरियां नजर आती हंै। शाहजहां भी पुष्क र के पंडितों क ा खासा सम्मान क रता था। उसने भी पंडि़तों क ो लाखों रु पए दान में दिए। जहांगीर ने ही यहां पशु मेेला प्र्रारंभ कि या। गुर्जरों के आराध्य देवनारायण ने पुुष्क र के नाग पहाड़ पर आराधना क ी। गुर्जर तो पुष्क र क ो श्रेष्ठतम तीर्थ मानते हैं। वर्तमान में ब्रह्मा मंदिर, जिसे औरंगजेब ने ध्वस्त कि या था। उसे १८०९ अजमेर के मराठा सूबेदार दौलतराव सिंधिया के मंत्री ने बनाया। आश्चर्य तो यह है कि ब्रिटेन क ी महारानी मेरी क ा पुष्क र पर ऐसा दिल आया कि उन्होंने यहां जनाना घाट तक बनवा दिया। बदलते वस्त के साथ पुष्क र भी बदल गया है। आज तीर्थराज पुष्क र विदेशी यात्रियों क ी मौज-मस्ती क ा के ंद्र बन गया है, जिससे क ई विकृ तियां पैदा होने लगी हैं। पुष्क र में पानी भी क म हो गया है। जगह-जगह कुं ड बनाक र बोरवैलों से पानी भरना पड़ता है। क भी पुष्क र के वास घने वन थे। नाग चंपा के इतने फू ल होते कि पुुष्क र महक ता था।
पुष्कर पशु मेला
राजस्थान में कई पर्यटन स्थल है। जिनमें से पुष्कर एक है। पुष्कर झील अजमेर नगर से ग्यारह किमी उत्तर में स्थित है। पुष्कर को तीर्थों का मुख माना जाता है। जिस प्रकार प्रयाग को तीर्थराज कहा जाता है।
पुष्कर को वेदमाता गायत्री की स्थली भी है। यह कई देवी-देवताओं की धर्म स्थली भी यही स्थान है। इस स्थल के महत्व को इसी बात से जाना जा सकता है, कि पुष्कर तीर्थो में गुरु कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार चार धाम की यात्रा अधूरी मानी जाती है, जब तक की पुष्कर की यात्रा न की जायें। इसे पांचवाम धाम कहना कुछ गलत न होगा।
पुष्कर में प्रतिवर्ष दो बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है, जिसमें से एक मेला अन्तर्राष्ट्रिय ख्याति प्राप्त है। यहां के मेले न केवल मेल-मिलाप के संयोग देते है साथ ही यह राजस्व कर के बड़े स्त्रोत है। इनमें से पहला मेला कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरु होकर, कार्तिक मास की पूर्णिमा तक रहता है। दूसरा मेला वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक रह्ता है। इन मेलों का प्रारम्भ पुष्कर झील की छतरी पर ध्वजारोहण व महा आरती से होती है। पुष्कर मेला राजस्थान की लोक संस्कृति का झलक देता है। इस धार्मिक मेले के अंतिम दिन तीर्थनगरी पुष्कर में लाखों की संख्या में लोग आते है। मेले में शामिल होने आये लोग इस झील सरोवर में स्नान कर स्वयं को धन्य करते है। इस मेले की प्रतिक्षा केवल भारत के विभिन्न राज्यों के निवासी ही नहीं, बल्कि अमेरिका,फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, जर्मनी, आस्ट्रेलिया और पौलेण्ड के निवासियों भी करते है। राजस्थान की लोक सांस्कृतिक, रंगारंग कार्यक्रम और मेले में, अलग-अलग तरह के झूले लोगों को सदा से ही अपनी ओर आकर्षित करते रहे है।
इतिहास पर एक नजर
तीर्थराज पुष्कर भारत के प्राचीनतम नगरों में से एक है। कहते हैं कि हड़प्पा और
मोहनजोदड़ों महानगर के निर्माण में पुष्कर के खानों से सीसा भेजा जाता था। लिहाजा कह सक ते हैं कि पुष्कर राजस्थान का डिस्ट्रिस्टगजेरिया यानी सिंधु घाटी की सभ्यता से भी प्राचीन था। पद्म पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने पुष्कर तीर्थ की स्थापना से सृष्टि के निर्माण का शुभारंभ कि या। इसे धरती क ा के ंद्र मानते हैं। वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि मेनक ा अप्सरा ने पुष्क र सरोवर में स्नान कर विश्वामित्र को सम्मोहित किया था। कालिदास की महानायिका शकुंतला का जन्म यहीं हुआ। गायत्री मंत्र की रचना पुष्कर में हुई। इसी तरह मार्कण्डेय ऋषि ने 'महामृत्युंजय मंत्रÓ क ी रचना यहीं क ी। दशावतार में मत्स्य, कू र्म और वराह अवतार भी पुष्क र में हुए। भगवान श्रीराम भी पधारे यहां गरु ड़, पद्म, हरिवंश पुराणों के अनुसार भगवान राम दो बार पुष्कर भी आए थे। दशरथ का श्राद्ध क रने, अगस्त्य ऋ षि से समुद्र सोखने और लंक ा विजय क ी मंत्र दीक्षा लेने। वह स्थान आज भी राम झरोखा के नाम से मशहूर है। राजस्थानी निजाम के अनुसार, 'आदित्य हृदय स्त्रोतÓ क ी दीक्षा पुष्क र में ही दी थी। भगवान कृ ष्ण ने भी पुष्कर प्रवास कि या था। उनसे जुड़े स्थान नंदगांव, गोकु ल, क ान्ह हथाई आज भी स्थित हैं। पुष्क र तीर्थ पर अनुसंधान क रने वाले आचार्य पं. ठाकु र प्रसाद पराशर ने विभिन्न प्राचीन धर्म ग्रंथों से साक्ष्य प्रमाणित कि ए हैं। इनके अनुसार 'महाभारतÓ में युधिष्ठिर क ी पुष्क र यात्रा क ा उल्लेख है। टोंक के प्रो. शिव शर्मा और डॉ. शरद हेवालक र के अनुसार, पुष्क र क भी बौद्ध और जैन धर्माचार्यों क ा पवित्रधाम था। जैन विद्वान इसे पद्मावती नगरी क हते थे। प्राचीन शिला लेखों में इसे क ोंक ण तीर्थ क हा गया है। क भी पुष्क र में बौद्ध विश्वविद्यालय हुआ क रता था। पुष्क र क ी संघरक्षिता बुढऱक्षिता ने सांची के स्तूपों में प्रकोष्ठ बनवाए। पुष्क र में गुरु नानक , गुरु गोविन्द सिंह, स्वामी दयानंद सरस्वती से लेक र महात्मा गांधी तक पधारे। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार हूण तोरमण ने पुुष्क र झील क ो मिट्टी से पाट दिया। बाद में मंडोर के राजा नाहर राव परिहार ने उत्खनन क र प्रतिष्ठित कि या। मुगल शासक ों क ो प्रिय था पुष्क र मुगल शासक ों क ो पुष्क र क ाफ ी रास आया। जहांगीर क ो तो पुष्क र इतना भाया कि उसने तेरह बार पुष्क र क ी यात्राएं क ी और यहां के पंडितों क ो जागीरें दान दीं। आज भी पुष्क र झील के दूसरे कि नारे जहांगीर द्वारा निर्मित बारहदरियां नजर आती हंै। शाहजहां भी पुष्क र के पंडितों क ा खासा सम्मान क रता था। उसने भी पंडि़तों क ो लाखों रु पए दान में दिए। जहांगीर ने ही यहां पशु मेेला प्र्रारंभ कि या। गुर्जरों के आराध्य देवनारायण ने पुुष्क र के नाग पहाड़ पर आराधना क ी। गुर्जर तो पुष्क र क ो श्रेष्ठतम तीर्थ मानते हैं। वर्तमान में ब्रह्मा मंदिर, जिसे औरंगजेब ने ध्वस्त कि या था। उसे १८०९ अजमेर के मराठा सूबेदार दौलतराव सिंधिया के मंत्री ने बनाया। आश्चर्य तो यह है कि ब्रिटेन क ी महारानी मेरी क ा पुष्क र पर ऐसा दिल आया कि उन्होंने यहां जनाना घाट तक बनवा दिया। बदलते वस्त के साथ पुष्क र भी बदल गया है। आज तीर्थराज पुष्क र विदेशी यात्रियों क ी मौज-मस्ती क ा के ंद्र बन गया है, जिससे क ई विकृ तियां पैदा होने लगी हैं। पुष्क र में पानी भी क म हो गया है। जगह-जगह कुं ड बनाक र बोरवैलों से पानी भरना पड़ता है। क भी पुष्क र के वास घने वन थे। नाग चंपा के इतने फू ल होते कि पुुष्क र महक ता था।
पुष्कर पशु मेला
पुष्कर में शुरु होना वाला पुष्कर मेला, पुष्कर पशु मेले के नाम से भी जाना जाता है। इस मेले में देश-विदेश से सैलानी वस्तुएं खरीदने और बेचने आते है। विशेष रुप से यह मेला ऊंट मेले के क्रय-विक्रय के लिये प्रसिद्ध है। इस मेले में पशु पालकों को विभिन्न नस्ल के पशु उपलब्ध होते है। अभी भी भारत की कृषि पशु पर आश्रित है। मेले में पशु की दौड़ प्रतियोगिता होती है और अन्य प्रतियोगिताएं भी आरम्भ से आकर्षण का केन्द्र रही है। इन प्रतियोगिताओं में अश्व प्रतियोगिता, ऊंट प्रदर्शन आदि किये जाते है। प्रतियोगिता से पहले ही उंटों के खान-पान, सेहत और साज-सज्जा का विशेष ध्यान रखा जाता है। ऊंटों की दौड़ में विजयी होने पर बड़े-बड़े ईनामों की घोषणा की जाती है। मेले के दिनों में ऊंट और घोड़ों की दौड़ खूब पसन्द की जाती है। मेले में लगने वाली दुकानें, झूले और कलाकारों के हस्त शिल्प की वस्तुओं कि प्रशंसा में शब्द भी मौन हो जाते है। सैलानियों के द्वारा ऊंट और जानवरों की सवारी का आनंन्द लेना, लोक संस्कृति और लोग संगीत की ध़ुनों पर थिरकते लोग समां बांध देते है। यह मेला अपने आकर्षण के कारण अन्तर्राष्ट्रिय ख्याति प्राप्त कर चुका है। धीरे-धीरे समय बीतने एक साथ-साथ यह मेला एक खूबसूरत पर्यटन मेले का रुप ले चुका है। अच्छी नस्ल के जानवरों का सौदा करने के लिये यह स्थान सर्वश्रेष्ठ बन गया है। यहां पर पशुओं की कीमत अच्छी मिल जाती है। यहां आकर ग्रामीण जीवन की संस्कृति को करीब से जाना जा सकता है।
पुष्कर मंदिरों की नगरी
पुष्कर मंदिरों की नगरी
पुष्कर मेले का माहौल किसी तीर्थ स्थल जैसा है। यहां पर राजस्थान के पारम्परिक व सांस्कृतिक वेश-भूषा मेम सजे देशी-विदेशी कलाकार अपनी कला प्रदर्शित करते रहते है। साधू संतों का जमावड़ा यहां देखा जा सकता है। पुष्कर की सुबह काशी तीर्थ स्थल की सुबह से कम सुन्दर नहीं होती। आरतियों की गूंज और घंटियों का अनाहाद हर किसी क अपनी ओर खींच लेता है।
आकर्षण का केंद्र
आकर्षण का केंद्र
पुष्कर मेला थार मरूस्थल का एक लोकप्रिय व रंगों से भरा मेला है। वैसे तो इस मेले का खास आकर्षण भारी संख्या में पशु ही होता है। फिर भी पुष्कर में भ्रमण के लिए यहां स्थित ४०० मंउिा है तथा जगह-जगह स्थित ५२ घाट पुष्कर के खास आकर्षण हैं। बदलते दौर के चलते यहां देश-विदेश से आये पर्यटकेां के बिीच क्रिकेट मेच,यहां के पारंपरिक नृतय,गीत संगीत,रंगोली,यहां के काठ पुतली नृत्य आदि भी इस मेले के विशेष आकर्षणों में शामिल है। इस मेले में ऊंट अथवा अन्य घरेलू जानवरों की क्रय-बिक्री के लिए लाए जाते हैं। इसे ऊॅंटों का मेला भी कहा जाता है। मेले के समय पुष्कर में कई संस्कृतियों का मिलन देखने को मिलता है। एक तरफ तो मेला देखने के लिए विदेशी सैलानी बड़ी संख्या में पहुंचते है तो दूसरी तरफ राजस्थान व आसपास के तमाम इलाकों से आदिवासी और ग्रामीण लोग अपने-अपने पशुओं के साथ मेले में शरीक होने आते हैं। मेला रेत के विशाल मैदान में लगाया जाता है। ढेर सारी कतार की कतार दुकानें,खाने-पीने के स्टाल,सर्कल,झूले और न जाने क्या-क्या। ऊंट मेला रेगिस्तान से नजदीकी को बताता है। इसलिए ऊंट तो हर तरफ देखने का मिलते ही हैं। देश-विदेशी सैलानियों को यह मेला इसलिए लुभाता है,क्योंकि यहां उम्दार जानवरों का प्रदर्शन तो होता ही है,राजस्थान की कला-संस्कृति की अनूठी झलक भी मिलती है। लोक संगीत और लोक धुनों की मिठास भी पर्यटकों को काफी लुभाती है। वैसे यहां सैलानियों के लिए मटका फोड़,लंबी मूंछ,दुल्हन प्रतियोगिता जैसे कार्यक्रम भी मेला आयोजकों द्वारा किए जाते हैं। इस मेले में विदेशी सैलानी बड़ी संख्या में भाग तो लेते ही हैं साथ ही साथ राजस्थान व आसपास के तमाम इलाकों से आदिवासी और ग्रामीण लोग अपने-अपने पशुओं के साथ मेले में शरीक होने आते हैं।
झारखंड : प्रकृति के सौंदर्य का खजाना
झारखंड पर प्रकृति ने अपने सौंदर्य को खुलकर लुटाया है। प्राकृतिक सुन्दरता के अलावा झारखण्ड ने अपने खूबसूरत पर्यटक स्थलों के दम पर विश्व के पर्यटक मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बनाई है। यहां के झरने और पर्यटक स्थल मिलकर झारखण्ड को पर्यटन का स्वर्ग बनाते हैं और पर्यटक शानदार छुट्टियां बिताने के लिए हर वर्ष यहां आते हैं। झारखंड हमारे देश के उन राज्यों में आता है जहां आप अभी भी प्राकृतिक सुषमा का वास्तविक आनंद ले सकते हैं। जंगल, पहाड़, घाटी, जलप्रपात, वन्य प्राणी, संस्कृति में धनी एवं मनमोहक राज्य हमेशा पयर्टकों के स्वागत में सदैव तत्पर है और धरती पर स्वर्ग का एक हिस्से के रूप में खड़ा है। छोटानागपुर क्षेत्र के घने जंगल, खूबसूरत वादियां, पहाडिय़ां व जलप्रपात पर्यटकों को नाटकीय दबाव से दूर उनमुक्त प्राकृतिक वातावरण उपलब्ध कराते हैं। झारखंड के मुख्य पर्यटन स्थल रांची, जमशेदपुर, देवघर, हजारीबाग, गिरिडीह, साहेबगंज व धनबाद में स्थित है। सम्पूर्ण भारत में झारखण्ड ही एक ऐसा राज्य है जहां पर आप आदिवासियों की प्राचीन संस्कृति से लेकर आधुनिक भारतीय संस्कृति का स्वरूप देख सकते हैं। झारखंड का प्राकृतिक सौन्दर्य व संस्कृति देश.विदेश के सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
प्राकृतिक सुंदर नजारों के साथ-साथ पुरानी गुफाएं, ऊंची पहाडिय़ां और हवा के संग-संग बहती नदियां आपको अपनी तरफ बरबस ही खींच लेंगी। झारखण्ड को कुदरत ने प्राकृतिक सौंदर्य तोहफे में पेश किया है। तभी तो यह एक ही नजर में सभी को लुभा लेता है। यहां की वादियां, घनघोर जंगल, मस्त पवन और बलखाती नदियां, पुरानी गुफाएं और मन में श्रद्धा जगाते अद्भुत मंदिर आपके दिलो-दिमाग पर इस कदर छाएंगे कि झारखण्ड की यह छवि आपकी आंखों में हमेशा के लिए बस जाएगी और आप बार-बार इस प्रदेश में घूमने के बारे में सोचेंगे। यहां ज्यादा नदियां और गुफाएं नहीं हैं, लेकिन जितनी भी हैं, वे लगातार पर्यटकों के आकर्षण केंद्र बनी रहती हैं। रंग-बिरंगे मेले और त्योहारों का अलग ही मजा है। प्राकृतिक व कृत्रिम सुंदरता के लिए प्रसिद्ध राजधानी रांची
झारखंड की राजधानी रांची समुद्र तट से 2140 फीट की ऊंचाई पर अपनी प्राकृतिक व कृत्रिम सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। यहां स्थित मुख्य पर्यटन स्थल टैगोर हिल, रॉक गार्डन, वार सिमेट्री, नक्षत्र वन, मैक्लुस्कीगंज, पंचघाघ, हिरणी फॉल सूर्य मंदिर, आंगनबाड़ी व जैविक उद्यान प्रमुख हैं। रांची से 40 किमी दूर पर रांची-टाटा मार्ग पर कांची नदी द्वारा प्राकृतिक रूप से निर्मित दसम फॉल जो कि 144 फीट की ऊंचाई से गिरता है रोमांचकारी अनुभव का आभास कराता है, इसके अलावा स्वर्णरेखा नदी द्वारा उद्गमित हुण्डरु फॉल अपनी 320 फीट की ऊंचाई से प्राकृतिक प्रतिस्पर्धा का निमंत्रण देता प्रतीत होता है, इसके अलावा जोन्हा फॉल व पंचघाघ फॉल भी आपको रोमांचित करने के लिए तत्पर हैं। रांची से लगभग 39 किमी की दूरी पर टाटा मार्ग पर बुंडू के निकट दर्शनीय सूर्य मंदिर है। इस मंदिर में एक विशाल रथ, अप्रतिम सौंदर्य से सुसज्जित पहियों व सात घोड़ों के साथ ऐतिहासिक वास्तुकला का बेहतरीन साक्ष्य है।
पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र : स्टील सिटी जमशेदपुर
झारखंड के औद्योगिक शहर के रूप में जमशेदपुर विश्वविख्यात है। पर्यटकों को टाटा स्टील कारखाना के अलावा जुबली पार्क, सर दोराबजी टाटा पार्क, डिमना लेक व डैमए दोमुहानी, टाटा स्टील ज्यूलॉजिकल पार्क, जुबली पार्क 225 एकड़ में स्थित है जिसे टाटा स्टील ने जमशेदपुर वासियों को उपहार स्वरूप भेट किया है। यहां स्थित डिमना झील शहर से लगभग 13 किलो मीटर दूर स्थित है, जो पिकनिक एवं बोटिंग के लिए लोगों को सहज ही अपनी तरफ आकर्षित करती है। जमशेदपुर में टाटा ने चिडिय़ां घर भी बनवाया है, जहां आप जानवरों के प्रत्येक प्रजातियों का अवलोकन कर सकते हैं जमशेदपुर से ही कुछ दूरी पर दलमा वन्यप्राणी शरणस्थली, घाटशीला, फुलदुंगरी, बुरूडीह लेक एवं दारागिरी जलप्रपात पर्यटकों का आकर्षण केंद्र हैं।
बाबा की नगरी देवघर
झारखंड का महाकुंभ कहा जाने वाला देवघर भारत में हिंदुओं की एक पवित्र नगरी के रूप में प्रसिद्ध है। प्रति वर्ष यहां लगने वाला श्रावणी मेला विश्र्व प्रसिद्ध है। धर्म और देवताओं के शहर देवघर को बाबा वैद्यनाथ की नगरी भी कहा जाता है। 12 ज्योतिर्लिगों में से एक यहां प्रसिद्ध बाबा वैद्यनाथ का ऐतिहासिक ज्योतिर्लिग है, जिसमें प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। प्रति वर्ष श्रावण मास में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु कम से कम 110 किमी की पैदल यात्रा कर बाबा वैद्यनाथ को जल अर्पण करते हैं। कांवरि, जन बिहार प्रांत के सुलतानगंज स्थिथ उत्तरवाहिनी सुरनदी गंगा का जल लेकर बाबा वैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं। इस पवित्र नगरी के आसपास हजारों धार्मिक महत्व के नजारे देखने को मिलते हैं। पर्यटक विशेष रूप से यहां सत्संग आश्रम, त्रिकुटी, नौलखा मंदिर का भ्रमण करते है।
हजार उद्यानों का शहर हजारीबाग
समुद्री तट से 2019 फीट की ऊंचाई पर स्थित हजार उद्यानों का शहर के रूप में जाना जाने वाला हजारीबाग एक प्रचलित हेल्थ रिसोर्ट है। यहां प्रमुख पर्यटन स्थल वन्यप्राणी शरणस्थली, कनहरी हिल, हजारीबाग लेकए तिलैया डैम, उर्वण टूरिस्ट कांपलेक्स, रजरप्पा, कोणार डैम, सूरज कुंड प्रमुख है। रांची से लगभग 80 किमी की दूरी पर रामगढ़-चितरपुर मार्ग पर स्थित रजरप्पा जहां बेहरा नदी, दामोदर नदी से मिलती है जहां मां छिन्नमस्तिके का मंदिर अवस्थित है। ईटखोरी में हरे-भरे जंगलों से घिरा हुआ मां भद्रकाली का यह प्रसिद्ध मंदिर भदूली नदी के किनारे सुरम्य वातावरण में है जो कि धर्मावलंबियों की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र हैं।
गिरीडीह
यहां जैन धर्म के महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक पवित्र हिल पारसनाथ राजधानी रांची से 190 किमी की दूरी पर स्थित है। 24 तीर्थकरों में से 23 तीर्थकरों को इसी स्थान पर मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसके अलावे बैद्याडीह, डालगंडो, झारखंडी डैम, खंडोली, हरिहर डैम एवं उसरी फाल यहां स्थित महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है।
झारखंड की रानी नेतरहाट
घने वनों से ढका हुआ है। यह एक सुन्दर पहाड़ी स्थल है, जिसे 'क्वीन ऑफ छोटानागपुरÓ के नाम से भी जाना जाता हैं। इस स्थान से कर्क रेखा भी गुजरती है। नेतरहाट वस्तुत: पठार पर स्थित है। नेतरहाट को झारखण्ड की मसूरी के नाम से भी जाना जाता है। नेतरहाट में अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है। यहां का सूर्योदय देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। यहां पर आपको घने जंगलों, उच्चे पर्वत शिखर घुमावदार सड़कों, झरनों, ठंडी हवाओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यहां की चांदनी रात पर्यटकों को बहुत लुभाती है। मंगोलिया प्वाइंट जो नेतरहाट से सिर्फ दस किमी दूर है आप यहां आकर डूबते हुए सूरज का नजारा देख सकते हैं, जो अवर्णनीय है। यहां के अपर गंगोत्री एवं लोअर गंगोत्री नामक झरना अपनी सुंदरता के लिए विख्यात है। व्यू प्वाइंट से आप कोयल नदी का विहंगम दृश्य भी देख सकते हैं।
खूबसूरत हिल स्टेशन : साहेबगंज
झारखंड की राजधानी रांची से सबसे अधिक दूरी पर स्थित साहेबगंज खूबसूरत हिल और जंगल के अलावे अपने सुंदर लैंडस्केप व जीवाश्म पार्क के कारण प्रसिद्ध है। तीर्थयात्रियों के लिए साहेबगंज के नजदीकी स्थानों पर अनेक मंदिर स्थित है। शिव मंदिर, विन्धवाशिनी मंदिर, शुक्रवाशिनी मंदिर विशेष आकर्षण केंद्र हैं। कन्हैयास्थान पर श्री श्री चैतन्य महाप्रभु के पदचिन्ह सुरक्षित है। साहेबगंज स्थित उधवा लेक न केवल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए बल्कि विभिन्न प्रजातियों के पक्षीयों के प्रवास के कारण भी प्रसिद्ध है। प्रवासी पक्षी काफी संख्या में प्रतिवर्ष यहां आते हैं। प्राचीन शहर राजमहल 12वीं सदी में अकबर के शासन के दौरान बनाया गया था। यहां स्थित जामी मस्जीद और बड़ा दरवाजा राजमहल के सुनहरे भूतकाल को प्रदर्शित करता है। शिव मंदिर, कन्हैया धाम, शिवगढ़ी, महाराजपूर और संगी दलान यहां के अन्य पर्यटन स्थल है। अपनी यात्रा के दौरान एक कार आरक्षित करवा कर राजमहल का आनंदपूर्वक भ्रमण किया जा सकता है।
काले हीरे का शहर धनबाद
भारत की सबसे बड़ी कोलफील्ड्स के साथ.साथ धनबाद झारखंड की प्रमुख औद्योगिक शहर के रूप में जाना जाता है। मां दुर्गा को समर्पित प्रसिद्ध शक्ति मंदिर धनबाद के ह्दय स्थल पर स्थित है। मैथन धाम, सिंदरीए इंडियन स्कूल आंफ माइंस, तोपचांची झील, पंचेत डैम एवं बोकारो स्टील सिटी यहां पर प्रमुख पर्यटन स्थल है।
बेतला राष्ट्रीय पार्क
1974 में स्थापित भारत के सबसे पुराने व विहंगम टाईगर रिजर्व में से एक बेतला राष्ट्रीय पार्क है जिसे पूर्व में पलामू टाईगर रिजर्व के नाम से जाना जाता था। बेतला राष्ट्रीय पार्क में आकर पर्यटक वन्य जीवों की दुर्लभ प्रजातियों से उन्मुख होते हैं। यहां बाघ, चीता, हाथी, गौर, सांभर, चितल, हिरण, नीलगाय, जंगली कुत्ता, लोमड़ी के कई प्रजाति देखने को मिलते हैं।
हजारीबाग आकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रकृति ने अपना सब कुछ इस क्षेत्र में ही समेट दिया है चाहे वो हरे-भरे घने जंगल हों, झरने सभी उल्लेखनीय सौन्दर्यं के प्रतीक हैं। यहां के वन प्राणियों में सांभर, हाथी, गौर, सांभर, चितल, हिरण, नीलगाय, जंगली कुत्ता, लोमड़ी की कई प्रजातियों देखने को मिलती हैं। इसके अलावे कोडरमा वन्यप्राणी शरणस्थली, पारसनाथ वन्यप्रणी शरणस्थली, पालकोट वन्यप्राणी शरणस्थली, उधवा झील पक्षी शरणस्थली, पलामू बाघ संरक्षणए सिंहभूम हाथी संरक्षण, भगवान बिरसा जैविक उद्यान, बिरसा कृग विहार, घडियाल प्रजनन केन्द्र प्रमुख हैं।
साहसिक पर्यटनसाहसिक पर्यटन के लिए भी झारखण्ड उत्तम स्थान है। पारसनाथ और सातपहाड़ हिल पाराग्लाइडींग और परासेलिंग के लिए प्रसिद्ध है।
रांची के रॉक-गार्डन, बिरसा जैविक उद्यान, तारामंडल, पहाड़ी मंदिर, जगरनाथ मंदिर, नक्षत्र वन, मछली घर, रांची विश्वविद्यालय के मानव म्यूजियम, खेलगांव स्थित म्यूजियम, रातू स्थित फन कैसल, ओरमांझी स्थित मगर प्रजनन केन्द्र, खूंटी स्थित मृग विहार केन्द्र, गुमला स्थित अंजना धाम, सिमडेगा के रामरेखा धाम, खूंटी जिले के हिरणी फॉल, चाईबासा जिले के महादेवालय, रामगढ़ जिले के रजरप्पा मंदिर, देवघर के बाबा बैजनाथ धाम, चतरा जिले के इटखोरी के मां भद्रकाली का मंदिर, कल्लुआ पहाड़, तमासीन फॉल सहित कई पर्यटन व दर्शनीय स्थल हैं, जिन्हें विकास कर पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
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